न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context३३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ० स्वप्नान्तविकल्पे च हेतुवचनम्। स्वप्नविषयाभिमानवदिति ब्रुवता स्वप्ना- न्तविकल्पे हेतुर्वाच्यः। कश्चित्स्वप्नो भयोपसंहितः, कश्चित्प्रमादोपसंहितः, कश्चि- दुभयविपरीतः, कदाचित्स्वप्नमेव न पश्यतीति। निमित्तवतस्तु स्वप्नविषयाभि- मानस्य निमित्तविकल्पाद्विकल्पोपपत्तिः॥ ३३ ॥ स्मृतिसङ्कल्पवच्च स्वप्नविषयाभिमानः ॥ ३४ ॥ पूर्वोपलब्धविषयः। यथा स्मृतिश्च सङ्कल्पश्च पूर्वोपलब्धविषयौ न तस्य प्रत्याख्यानाय कल्पेते, तथा स्वप्ने विषयग्रहणं पूर्वोपलब्धविषयं न तस्य प्रत्या- ख्यानाय कल्पते इति। एवं दृष्टाविषयश्च स्वप्नान्तो जागरितान्तेन। यः सुप्तः स्वप्नं पश्यति स एव जाग्रत्स्वप्नदर्शनानि प्रतिसन्धत्ते—इदमद्राक्षमिति। तत्र जाग्रद्बुद्धिवृत्ति- वशात्स्वप्नविषयाभिमानो मिथ्येति व्यवसायः। सति च प्रतिसन्धाने या जाग्रतो बुद्धिवृत्तिस्तद्वशादयं व्यवसायः स्वप्नविषयाभिमानो मिथ्येति। उभयाविशेषे तु साधनानर्थक्यम्। यस्य स्वप्नान्तजागरितान्तयोरविशेषस्तस्य स्वप्नविषयाभिमानवदिति साधनमनर्थकम्; तदाश्रयप्रत्याख्यानात्। स्वप्नविकल्प में भी हेतु देना चाहिये ! पूर्वपक्षी को 'स्वप्नविषयाभिमानवत्' कहते हुए हेतु भी रखना चाहिये। कोई स्वप्न राग से, कोई भय से, कोई प्रमाद से तथा कोई इनके अभाव अर्थात् अदृष्ट से होता है, कोई पुरुष स्वप्न देखता ही नहीं। निमित्तवान् स्वप्नविषयाभिमान के निमित्तविकल्प से निमित्तविकल्प बन जायेगा ॥ ३३ ॥ स्वप्नविषयाभिमान भी स्मृति तथा सङ्कल्प के समान ॥ ३४ ॥ पूर्वोपलब्ध विषय वाला है। जैसे स्मृति और सङ्कल्प पूर्वोपलब्धविषयक ही होते हैं, उनका प्रत्याख्यान नहीं किया जा सकता; उसी तरह स्वप्न में दिखायी देने वाला विषय भी पूर्वोपलब्ध है, उनका प्रत्याख्यान कैसे होगा ! इस तरह स्वप्न-ज्ञान जाग्रज्ज्ञान से दृष्टविषय है। सोया हुआ मनुष्य जो कुछ स्वप्न में देखता है, जगने पर वह उसका प्रतिसन्धान करता है कि 'ऐसा मैंने स्वप्न में देखा था'। यों जाग्रज्ज्ञान होने पर जाग्र- त्पुरुष की ज्ञानवृत्ति के कारण यह निश्चय होता है कि स्वप्न में देखा गया विषय मिथ्या था; क्योंकि वह इस समय उपलब्ध नहीं है। यदि इन दोनों ( स्वाप्न एवं जाग्रत ) ज्ञानों को ही मिथ्या मानें तो साधनानर्थक्य होने लगेगा। यो, स्वाप्न तथा जाग्रत—दोनों ही ज्ञानों को मिथ्या मानता है, उसके लिये बाकी क्या रह जाता है कि उसे वह सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है; क्योंकि उसने तो उस मिथ्याज्ञान के आश्रय जाग्रज्ज्ञानाधीन वस्तु का ही प्रत्याख्यान ( अप- लाप ) कर दिया ! अर्थात् जाग्रत् से स्वप्न या स्वप्न से जाग्रज्ज्ञान होता हैं—इसमें विनिगमन करना ही कठिन है।