न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context२. सू० ] सत्प्रतिपक्षदेशनाभासप्रकरणम् ३४५ लक्षणं तु— साधर्म्यवैधर्म्याभ्यामुपसंहारे तद्धर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्यवैधर्म्यसमौ ॥ २ ॥ साधर्म्येणोपसंहारे—साध्यधर्मविपर्ययोपपत्तेः साधर्म्येणैव प्रत्यवस्थानम- विशिष्यमाणं स्थापनाहेतुतः साधर्म्यसमः प्रतिषेधः । निदर्शनम्—‘क्रियावानात्मा, द्रव्यस्य क्रियाहेतुगुणयोगात्; द्रव्यं लोष्टः क्रियाहेतुगुणयुक्तः क्रियावान्, तथा चात्मा, तस्मात् क्रियावान्’ इति । एवमुपसंहृते, परः साधर्म्येणैव प्रत्यवतिष्ठते— ‘निष्क्रिय आत्मा; विभुनो द्रव्यस्य निष्क्रियत्वाद्, विभु चाकाशं निष्क्रयं च, तथा चात्मा, तस्मान्निष्क्रिय.’ इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रियावत्साधर्म्यात् क्रियावता भवितव्यम्, न पुनरक्रियसाधर्म्याद् निष्क्रियेणेति । विशेषहेत्व- भावात् साधर्म्यसमः प्रतिषेधो भवति । अथ वैधर्म्यसमः—‘क्रियाहेतुगुणयुक्तो लोष्टः परिच्छिन्नो दृष्टः, न च तथाऽऽत्मा, तस्मान्न लोष्टवत् क्रियावान्’ इति । न चास्ति विशेषहेतुः—क्रिया- 'साधर्म्यसम' तथा 'वैधर्म्यसम' का लक्षण हैं— साधर्म्य तथा वैधर्म्य से वादी द्वारा साध्य का उपसंहार करने पर, प्रतिवादी द्वारा उस साध्यधर्म के व्यतिरेक का ( व्याप्त्यनपेक्ष ) केवल साधर्म्य वैधर्म्य से उपपादन करना 'साधर्म्यसम' तथा 'वैधर्म्यसम' जाति कहलाती हैं ॥ २ ॥ साधर्म्य द्वारा उपसंहार किये जाने पर, साध्यधर्म के अभाव का उपपादन न कर प्रतिवादी व्याप्त्यनपेक्ष केवल साधर्म्य से स्थापनाहेतु के समान ही प्रतिषेध उपस्थित कर दे उसे 'साधर्म्यसम' कहते हैं। उदाहरण के लिए 'आत्मा क्रियावान् है, द्रव्य के क्रिया- हेतुगुणयुक्त होने से; लोष्टद्रव्य जैसे क्रियाहेतुगुणयुक्त है अतः क्रियावान् है, वैसे ही आत्मा भी द्रव्य है, अतः वह भी क्रियावान् हैं'—ऐसा वादी द्वारा साध्य का उपसंहार किये जानेपर, प्रतिवादी उदाहरणान्तर के साधर्म्य ( व्याप्त्यनपेक्ष ) से ही प्रतिषेधात्मक प्रयोग करता है—'आत्मा निष्क्रिय है, विभु द्रव्य के निष्क्रिय होने से जैसे आकाश विभु तथा निष्क्रिय है, वैसे ही आत्मा भी विभु हैं, अतः वह निष्क्रिय है ।' यहाँ वादी के उपसंहार तथा प्रतिवादी के प्रत्यवस्थान में कोई विशेष अर्थात् हेतु व्याप्तिविशिष्ट नहीं हैं कि जिससे किसी को प्रमाण माना जा सके । अतः यह कैसे निश्चय किया जाये कि क्रियावत्साधर्म्य से क्रियावान् ही सिद्ध हो; अक्रिय साधर्म्य से निष्क्रिय सिद्ध न हो । यों विशेष हेतु न होने से यह 'साधर्म्य' प्रतिषेध है । इसी में 'वैधर्म्यसम' का उदाहरण सुनिये—'क्रियाहेतुगुणयुक्त लोष्ट परिच्छिन्न देखा जाता है ऐसा आत्मा नहीं देखा जाता, अतः वह लोष्ट की तरह क्रियावान् नहीं हैं'—इस प्रयोग में भी ऐसा कोई विशेष हेतु नहीं दिखाया गया कि जिससे यह सिद्ध हो सके कि क्रियावत्साधर्म्य से क्रियावान् ही सिद्ध हो, तथा क्रियावद्वैधर्म्य से निष्क्रिय न