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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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३४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० वर्ण्यावर्ण्यसमौ भवतः । साधनधर्मयुक्ते दृष्टान्ते धर्मान्तरविकल्पात् साध्यधर्मविकल्पं प्रसजतो विकल्पसमः । क्रियाहेतुगुणयुक्तं किञ्चिद् गुरु यथा लोष्टः, किञ्चिल्लघु यथा वायुः । एवं क्रियाहेतुगुणयुक्तं किञ्चित्क्रियावत् स्यात् यथा लोष्टः, किञ्चिद- क्रियं यथा आत्मा । विशेषो वा वाच्य इति । हेत्वाद्यवयवसामर्थ्ययोगी धर्मः साध्यः, तं दृष्टान्ते प्रसजतः साध्यसमः । 'यदि यथा लोष्टस्तथाऽऽत्मा'; प्राप्तस्तर्हि 'यथाऽऽत्मा तथा लोष्टः' इति । साध्य- श्चायमात्मा क्रियावानिति कामं लोष्टोऽपि साध्यः । अथ नैवम्, न तर्हि 'यथा लोष्टः तथाऽऽत्मा' ॥ ४ ॥ एतेषामुत्तरम्— किञ्चित्साधर्म्यादुपसंहारसिद्धेर्वैधर्म्यादप्रतिषेधः ॥ ५ ॥ अलभ्यः सिद्धस्य निह्नवः, सिद्धं च किञ्चित्साधर्म्यादुपमानम्—'यथा गौस्तथा गवयः' इति । तत्र न लभ्यो गोगवययोर्धर्मविकल्पश्चोदयितुम् । एवं साधके धर्मे दृष्टान्तादिसामर्थ्ययुक्ते न लभ्यः साध्यदृष्टान्तयोर्धर्मविकल्पाद् वैधर्म्यात् प्रतिषेधो वक्तुमिति ॥ ५ ॥ दृष्टान्त के सादृश्यमात्र से पक्ष में साध्याभाव का आपादन 'अवर्ण्यसम' कहलाता है । साधनधर्मयुक्त दृष्टान्त में धर्मान्तरविकल्प से साध्यधर्मविकल्प का आपादन करना 'विकल्पसम' कहलाता है। जैसे—'क्रियाहेतुगुणयुक्त कोई गुरु होता है, जैसे लोष्ट, कोई लघु होता है जैसे वायु; इसी तरह क्रियाहेतुगुण-युक्त कोई क्रियावान् होगा, जैसे— लोष्ट, कोई अक्रिय भी होगा जैसे—आत्मा'। अन्यथा विशेष में कोई हेतु बतावें । हेत्वाद्यवयवसामर्थ्ययोगी धर्म साध्य होता है, उसका दृष्टान्त में आपादन करना 'साध्यसम' कहलाता है। जैसे—'यदि जैसा लोष्ट है वैसा ही आत्मा है तो जैसा आत्मा है वैसा ही लोष्ट भी होना चाहिये, अभी तो आत्मा साध्य है, तो लोष्ट भी वैसा ही होना चाहिये, यदि ऐसा नहीं है तो जैसा लोष्ट है वैसा आत्मा नहीं है' ॥ ४ ॥ इन छहों जातिप्रतिषेधों का उत्तर है— किञ्चित्साधर्म्य से उपसंहारसिद्धि द्वारा वैधर्म्य से प्रतिषेध नहीं होता ॥ ५ ॥ सिद्ध को छिपाया नहीं जा सकता, उसे जैसा है वैसा स्वीकार करना पड़ेगा । वे ही सिद्ध कुछ सादृश्य लेकर ही उपमान बनते हैं, जैसे—'जैसी गौ वैसा गवय होता है'—यहाँ गौ तथा गवय के पूर्णसादृश्य ( सास्नादिमत्त्वेन ) के लिये आप आग्रह नहीं कर सकते । कुछ न कुछ असमानता तो होगी ही । इस प्रकार साधक धर्म में दृष्टान्त के सभी धर्म न मिलें तो साध्य तथा दृष्टान्त के धर्मविकल्प से प्रश्न तथा प्रतिषेध—दोनों ही अनुचित हैं ॥ ५ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri