न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context३५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० उभयथा खल्व्युक्तः प्रतिषेधः। कर्तृकरणाधिकरणानि प्राप्य मृदं घटादि- कार्यं निष्पादयन्ति, अभिचाराच्च पीडने सति दृष्टमप्राप्य साधकत्वमिति ॥ ८ ॥ प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमप्रकरणम् [ ९-११ ] दृष्टान्तस्य कारणानपदेशात् प्रत्यवस्थानाच्च प्रतिदृष्टान्तेन प्रसङ्गप्रतिदृष्टान्तसमौ ॥ ९ ॥ साधनस्यापि साधनं वक्तव्यमिति प्रसङ्गेन प्रत्यवस्थानं प्रसङ्गसमः प्रतिषेधः। 'क्रियाहेतुगुणयोगो क्रियावान् लोष्टः' इति हेतुर्नापदिश्यते, न च हेतुमन्तरेण सिद्धिरस्तीति। प्रतिदृष्टान्तेन प्रत्यवस्थानं प्रतिदृष्टान्तसमः। 'क्रियावानात्मा; क्रियाहेतुगुण- योगाद्, लोष्टवत्' इत्युक्ते प्रतिदृष्टान्त उपादीयते—'क्रियाहेतुगुणयुक्तमाकाशं निष्क्रियं दृष्टम्' इति। कः पुनराकाशस्य क्रियाहेतुगुणः ? वायुना संयोगः संस्कारापेक्षः, वायुवनस्पतिसंयोगवदिति ॥ ९ ॥ उक्त दोनों ही प्रकार का प्रतिषेध युक्त नहीं; क्योंकि घटादि का निष्पादन कर्ता ( कुम्भकार ) करण ( दण्ड-चक्र आदि ) तथा अधिकरण ( भूतलादि ) इन सबके साथ मृत्पिण्ड मिलने पर ही होता है। तो क्या साधकत्व उनका अनुपपन्न है ? और उधर शत्रु के पीड़न के लिये जो अभिचार (मारण) क्रियाएँ की जाती हैं उनमें क्रियाकारक के साथ शत्रु का सम्मेलन आवश्यक नहीं, फिर भी उन क्रियाओं से शत्रुपीड़न देखा जाता है। यों प्राप्ति या अप्राप्ति से साध्यसाधनभाव का प्रतिषेध नहीं हो पाता ॥ ८ ॥ [ अब 'प्रसङ्गसम' तथा 'प्रतिदृष्टान्तसम' का लक्षण करते हैं—] दृष्टान्त के कारणानभिधान से तथा प्रतिदृष्टान्त के प्रतिषेध से क्रमशः 'प्रसङ्गसम' तथा 'प्रतिदृष्टान्तसम' प्रतिषेध कहलाते हैं ॥ ९ ॥ यद्यपि दृष्टान्त का दृष्टान्त नहीं हुआ करता, परन्तु वाद में जब दृष्टान्त का दृष्टान्त पूछा जाये तो उनके भी हेतु तथा दृष्टान्त का प्रसंग आ पड़ेगा, इसे 'प्रसंगसम' प्रतिषेध कहते हैं। जैसे 'क्रियाहेतुगुणयोगी क्रियावान् होता है, जैसे लोष्ट', यहाँ हेतु नहीं कहा गया, हेतु के बिना सिद्धि होती नहीं। अतः इस दृष्टान्त में प्रतिवादी पूछता है कि 'यह क्रियावान् क्यों हैं'। यही 'प्रसङ्गसम' है। विरोधी प्रतिदृष्टान्त से प्रतिषेध 'प्रतिदृष्टान्तसम' कहलाता है। उसमें भी साधन करना जैसे—'आत्मा क्रियावान् है, क्रियाहेतुगुणयोग से, लोष्ट की तरह'—ऐसा कहने पर प्रतिवादी प्रतिदृष्टान्त दे सकता है—'क्रियाहेतुगुणयुक्त आकाश निष्क्रिय देखा गया है, अतः आत्मा निष्क्रिय है', यों प्रतिदृष्टान्त से वह वादी की बात का खण्डन करता है। फिर वादी पूछता है—'आकाश में क्रियाहेतुगुण क्या हैं' ? प्रतिवादी उत्तर देता है—'उसका वायु के साथ संस्कारापेक्ष संयोग, वायु-वनस्पतिसंयोग की तरह' ॥ ९ ॥