न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context४. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् १९ नामधेयमिति । यदा तु सोऽर्थो गृह्यते, तदा तत् पूर्वस्मादर्थज्ञानान्न विशिष्यते, तत् अर्थविज्ञानं तादृगेव भवति । तस्य त्वर्थज्ञानस्यान्यः समाख्याशब्दो नास्ति, येन प्रतीयमानं व्यवहाराय कल्पेत, न चाप्रतीयमानेन व्यवहारः । तस्माज्ज्ञेय- स्यार्थस्य संज्ञाशब्देनेतिकरणयुक्तेन निर्दिश्यते-'रूपम्' इति ज्ञानम्, 'रसः' इति ज्ञानमिति । तदेवमर्थज्ञानकाले १ स न समाख्याशब्दो व्याप्रियते, व्यवहारकाले तु व्याप्रियते । तस्मादशाब्दमर्थज्ञानमिन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नमिति । ग्रीष्मे मरीचयो भौमेनोष्मणा संसृष्टाः स्पन्दमाना दूरस्थस्य चक्षुषा सन्निकृष्यन्ते, तत्रेन्द्रियार्थसन्निकर्षाद् 'उदकम्' इति ज्ञानमुत्पद्यते, तच्च प्रत्यक्षं प्रसज्यते ? इत्यत आह-अव्यभिचारीति । यद् 'अतस्मिंस्तत्' इति, तद् व्यभिचारि; यत्तु 'तस्मिंस्तत्' इति, तदव्यभिचारि प्रत्यक्षमिति । दूराच्चक्षुषा ह्ययमर्थं पश्यन्नावधारयति-धूम इति वा, रेणुरिति वा; तदेतदिन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नमनवधारणज्ञानं प्रत्यक्षं प्रसज्यते ? इत्यत आह- होता है। शब्दार्थसम्बन्ध के गृहीत होने पर भी 'इस अर्थ का यह शब्द वाचक हैं' ऐसा व्यवहार होता है। जब यह अर्थ गृहीत होता है तो यह ज्ञान पूर्व ज्ञान (जिसमें अर्थ गृहीत नहीं हुआ था) से भिन्न (विशेष) नहीं, वह अर्थ-विज्ञान भी वैसा ही होता है। उस अर्थ-ज्ञान का कोई दूसरा शब्द बोधक नहीं है, जिससे वह प्रतीत होता हुआ व्यव- हार में आवे । अप्रतीत से व्यवहार होता नहीं । इसलिये ज्ञेय अर्थ का संज्ञाशब्द के साथ 'इति' (= ऐसा ) लगाकर निर्देश किया जाता है— 'रूप ऐसा ज्ञान', 'रस ऐसा ज्ञान' । इस प्रकार यही समझिए कि वह समाख्या (अर्थबोधक) शब्द अर्थज्ञानकाल में व्यापृत नहीं होता, परन्तु व्यवहारकाल में व्यापृत हो पाता है। अतः सिद्धान्ततः यह निष्कर्ष निकला कि शब्दरहित अर्थज्ञान ही इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न होता है। शङ्का—ग्रीष्म काल में पार्थिव उष्णता से मिलकर सूर्य की किरणें चाकचिक्य पैदा करती हुई दूरदेशस्थ पुरुष के नेत्रों के समीप आ जाती हैं, वहाँ इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से जल की भ्रान्ति प्रतीति होती है, वहाँ भी प्रत्यक्ष का व्यवहार होने लगेगा ? अतः लक्षण में व्यावर्तक शब्द लगाया गया है— 'अव्यभिचारि' । जो 'तदभाववान्' में 'तद्' ऐसा ज्ञान 'व्यभिचारि' कहलाता है, तथा जो 'तद्वान्' में 'तत्' ऐसा ज्ञान 'अव्यभिचारि' कहलाता है, वही प्रत्यक्ष है । (मरीचिका में जलप्रतीति प्रत्यक्ष नहीं, अपितु भ्रमप्रतीतिमात्र है ।) शङ्का—पुरुष दूर से अपनी आँखों से देखता हुआ विचार करता है कि 'यह धूम है, या यह धूलि हैं'; क्या यह इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्न संशय-ज्ञान भी प्रत्यक्ष कहलायेगा ? १. ०भानकाले-पा० ।