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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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३६२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ० संवेदनीयौ—'अस्ति मे संशयज्ञानम्, नास्ति मे संशयज्ञानम्' इति। एवं प्रत्यक्षानु- मानागमस्मृतिज्ञानेषु। सेयमावरणाद्यनुपलब्धिरुपलब्ध्यभावः स्वसंवेद्यः--'नास्ति मे शब्दस्याऽऽवरणाद्युपलब्धिः' इति, नोपलभ्यन्ते शब्दस्याग्रहणकारणान्या- वरणादीनीति। तत्र यदुक्तम्-'तदनुपलब्धेरनुपलम्भादभावसिद्धिः' इति, एतन्नो- पपद्यते ॥ ३१ ॥ अनित्यसमप्रकरणम् [ ३२-३४ ] साधर्म्यात्तुल्यधर्मोपपत्तेः सर्वानित्यत्वप्रसङ्गादनित्यसमः ॥ ३२ ॥ अनित्येन घटेन साधर्म्यात्—'अनित्यः शब्दः' इति ब्रुवतोऽस्ति घटेनानित्येन सर्वभावानां साधर्म्यमिति सर्वस्यानित्यमनिष्टं सम्पद्यते। सोऽयमनित्यत्वेन प्रत्यवस्थानात्--अनित्यसम इति ॥ ३२ ॥ अस्योत्तरम्— साधर्म्यादसिद्धेः प्रतिषेधासिद्धिः प्रतिषेध्यसाधर्म्याच्च ॥ ३३ ॥ प्रतिज्ञाद्यवयवयुक्तं वाक्यं पक्षनिर्वर्तकम्, प्रतिपक्षलक्षणं प्रतिषेधः, तस्य पक्षेण प्रतिषेध्येन साधर्म्यं प्रतिज्ञादियोगः। तद्यद्यनित्यसाधर्म्यादनित्यत्वस्या- अनुभूत होते रहते हैं, जैसे—'यहाँ मुझे संशयज्ञान है' 'यहाँ नहीं है'। इसी तरह प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम तथा स्मृति में भी ज्ञानविकल्प समझ लेने चाहिये। आवरणद्यनुपलब्धि के रूप में उपलब्ध्धयभावस्वरूप से स्वसंवेद्य किया जाता है, जैसे—'मुझे शब्द की आवर- णाद्युपलब्धि नहीं हो रही है।' शब्द के रूप में अग्रहणकारण आवरणादि उपलब्ध नहीं होते! अतः आपका यह कहना कि उसकी अनुपलब्धि के अनुपलम्भ से उसका अभाव सिद्ध होता है—उचित नहीं ॥ ३१ ॥ अब 'अनित्यसम' का लक्षण कर रहे हैं— सादृश्य से तुल्यधर्म की उपपत्ति द्वारा सब में अनित्यत्व के प्रसंग से 'अनित्यसम' प्रतिषेध बनता है ॥ ३२ ॥ जैसे—'अनित्य घट के साधर्म्य से शब्द अनित्य है'—ऐसा कहने पर प्रतिवादी यह कहें कि 'घट भी एक पदार्थ है, उसके साथ पदार्थत्वेन साधर्म्य होने से सब पदार्थ अनित्य होंगे। उसका यह अनित्यत्व से प्रतिषेध 'अनित्यसम' कहलाता है ॥ ३२ ॥ इसका उत्तर— साधर्म्य से असिद्धि मानने पर प्रतिषेध्यसाधर्म्य से प्रतिषेध की भी असिद्धि होने लगेगी ॥ ३३ ॥ प्रतिज्ञाद्यवयवयुक्त वाक्य पक्ष स्थापित करता है। प्रतिषेधवाक्य प्रतिषेधस्थापक है, उसका प्रतिषेध्य पक्ष के साथ प्रतिज्ञाद्यवयव से साधर्म्य है, यद्यपि यदि अनित्यसाधर्म्य