न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context३७० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० २. आ० [ द्वितीयमाह्निकम् ] विप्रतिपत्त्यप्रतिपत्त्योर्विकल्पान्निग्रहस्थानबहुत्वमिति सङ्क्षेपेणोक्तम् ( १.२.२०), तदिदानीं विभजनीयम् । निग्रहस्थानानि खलु पराजयवस्तून्य- पराधाधिकरणानि प्रायेण प्रतिज्ञाद्यवयवाश्रयाणि तत्त्ववादिनमतत्त्ववादिनं चाभिसम्प्लवन्ते । तेषां विभागः— प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञान्तरं प्रतिज्ञाविरोधः प्रतिज्ञासंन्यासो हेत्वन्तरमर्थान्तरं निरर्थकमविज्ञातार्थमपार्थकमप्राप्तकालं न्यूनमधिकं पुनरुक्तमननुभाषणमज्ञानम- प्रतिभा विक्षेपो मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षणं निरनुयोज्यानुयोगोऽपसिद्धान्तो हेत्वा- भासाश्च निग्रहस्थानानि ॥ १ ॥ तानीमानि द्वाविंशतिधा विभज्य लक्ष्यन्ते ॥ १ ॥ निग्रहस्थानपञ्चकप्रकरणम् [ २-६ ] प्रतिदृष्टान्तधर्माभ्यनुज्ञा स्वदृष्टान्ते प्रतिज्ञाहानिः ॥ २ ॥ साध्यधर्मप्रत्यनीकेन धर्मेण प्रत्यवस्थिते प्रतिदृष्टान्तधर्मं स्वदृष्टान्तेऽभ्यनु- जानन् प्रतिज्ञां जहातीति 'प्रतिज्ञाहानिः' । निदर्शनम्—'ऐन्द्रियकत्वादनित्यः 'विप्रतिपत्ति तथा अप्रतिपत्ति के विकल्प से बहुत से निग्रहस्थान हैं' ऐसा हम पीछे ( १. २. २०) संक्षेप से बता आये हैं। उसका अब विस्तार से वर्णन करना चाहिये। निग्रहस्थान वे होते हैं जिनमें जकड़े जाने से वादी या प्रतिवादी पराजय पा सकते हैं। ये निग्रहस्थान पराजयाधिकरण हैं तथा प्रतिज्ञादि अवयवों का आश्रय लिये रहते हैं। और वादी प्रतिवादी को किङ्कर्तव्यविमूढ बनाते हैं, अतः इनका ज्ञान भी होना आवश्यक है। उन निग्रहस्थानों का विभाग ( परिगणन ) यह है— १. प्रतिज्ञाहानि, २. प्रतिज्ञान्तर, ३. प्रतिज्ञाविरोध, ४. प्रतिज्ञासंन्यास, ५. हेत्व- न्तर, ६. अर्थान्तर, ७. निरर्थक, ८. अविज्ञातार्थ, ९. अपार्थक, १०. अप्राप्तकाल, ११. न्यून, १२. अधिक, १३. पुनरुक्त, १४. अननुभाषण, १५. अज्ञान, १६. अप्रतिभा, १७. विक्षेप, १८. मतानुज्ञा, १९. पर्यनुयोज्योपेक्षण, २०. निरनुयोज्यानुयोग, २१. अप- सिद्धान्त तथा २२. हेत्वाभास—ये निग्रहस्थान हैं ॥ १ ॥ इन बाईस प्रकार से विभक्त निग्रहस्थानों का वक्ष्यमाण सूत्रों में लक्षण करेंगे ॥१॥ उनमें प्रथम 'प्रतिज्ञाहानि' निग्रहस्थान का लक्षण कर रहे हैं— परपक्ष के धर्म को मानना अपने पक्ष में 'प्रतिज्ञाहानि' कहलाता है ॥ २ ॥ वादी स्थापनापक्ष उपस्थित करता है, तब प्रतिवादी वादिसाध्यरूप धर्म का विरुद्ध धर्म से प्रत्याख्यान करता है, और प्रतिदृष्टान्त भी कहता है। अब यदि वादी प्रति- वाद्युक्त प्रतिदृष्टान्तधर्म (साध्यविरुद्ध धर्म) को ( स्वदृष्टान्त में ) स्वीकार कर लेता हो तो प्रतिज्ञा को छोड़ बैठता है यह उसकी प्रतिज्ञाहानि है। उदाहरण के लिये—'ऐन्द्रियक