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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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५. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् २१ तन्त्रान्तरसमाचाराच्चैतत् प्रत्येयमिति । 'परमतमप्रतिषिद्धमनुमतम्' इति हि तन्त्रयुक्तिः ॥ ४ ॥ व्याख्यातं प्रत्यक्षम् ॥ ० (ख) अनुमानलक्षणम् अथ तत्पूर्वकं२ त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतोदृष्टं च ॥ ५ ॥ 'तत्पूर्वकम्' इत्यनेन लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बन्धदर्शनं लिङ्गदर्शनं चाभि- सम्बध्यते । लिङ्गलिङ्गिनोः सम्बद्धयोर्दर्शनेन लिङ्गस्मृतिरभिसम्बध्यते । स्मृत्या लिङ्गदर्शनेन चाप्रत्यक्षोऽर्थोऽनुमीयते । पूर्ववदिति-यत्र कारणेन कार्यमनुमीयते, यथा-मेघोन्नत्या 'भविष्यति वृष्टिः' इति । शेषवत् तत्-यत्र कार्येण कारणमनुमीयते, पूर्वोदकविपरीतमूदकं नद्याः पूर्णत्वं शीघ्रत्वं च दृष्ट्वा स्रोतसोऽनुमीयते-'भूता वृष्टिः' इति । सामान्यतो- उसका इस तन्त्र ( न्यायदर्शन ) में खण्डन नहीं किया गया, अतः सूत्रकार को मन का इन्द्रियत्व अभिप्रेत है—ऐसा मान लेना चाहिये; क्योंकि तन्त्रकारों की एक यह भी युक्ति है कि दूसरे मत का यदि हम खण्डन नहीं करते तो वह हमें मान्य है ॥ ४ ॥ प्रत्यक्ष का व्याख्यान कर दिया गया ॥ प्रत्यक्ष का निरूपण करने के बाद अब अनुमान का निरूपण करते हैं— प्रत्यक्षपूर्वक अनुमितिकरण को 'अनुमान' कहते हैं। वह तीन प्रकार का होता है— १. पूर्ववत्, २. शेषवत् तथा ३. सामान्यतोदृष्ट ॥ ५ ॥ यहाँ 'तत्पूर्वक' इस पद से लिङ्ग (हेतु) लिङ्गी ( हेतुमान् ) का सम्बन्ध (व्याप्ति)- दर्शन तथा लिङ्गदर्शन—इन दोनों का भी परामर्श कर लेना चाहिये । सम्बद्ध हेतु लिङ्ग- स्मृति से सम्बद्ध होता है । स्मृति और लिङ्ग-परामर्श व्यापार से अप्रत्यक्ष अर्थ का अनु- मान होता है । पूर्ववत् उसे कहते हैं जहाँ कारण से कार्य का अनुमान हो, जैसे—बादलों के घिर जाने से 'वर्षा होगी' यह अनुमान होता है । शेषवत् उसे कहते हैं जहाँ कार्य से कारण का अनुमान हो, जैसे नदी में पहले के जल से बढ़ा हुआ जल देखकर या नदी को बढ़ी हुई, वेग से बहती हुई देख कर 'वर्षा हुई है' ऐसा अनुमान होता है । सामान्यतोदृष्ट वह कहलाता है जिसे पहले कहीं देखा हो बाद में कहीं देखे तो उसमें गति का अनुमान १. तन्त्रयुक्तिरियं बौद्धनैयायिकचक्रवर्त्तिदिङ्नागकृते 'प्रमाणसमुच्चये' दृश्यते । २. एतत्पदस्य विस्तृतं व्याख्यानं वार्त्तिकेऽनुसन्धेयम् ।