BharatKosha
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

Page 397 of 410

Read in context
Page 397

२४. सू० ] कथकान्त्योक्तिनिरूप्यनिग्रहस्थानद्वयप्रकरणम् ३७९ कस्यचिदर्थस्य तथाभावं प्रतिज्ञाय प्रतिज्ञातार्थविपर्ययाद् अनियमात् कथां प्रसञ्जयतोऽपसिद्धान्तो वेदितव्यः। यथा 'न सदात्मानं जहाति, न सतो विनाशः, नासदात्मानं लभते, नासदुत्पद्यते' इति सिद्धान्तमभ्युपेत्य स्वपक्षं व्यवस्थापयति- 'एकप्रकृतीदं व्यक्तं विकाराणामन्वयदर्शनात् । मृदन्वितानां शरावादीनां दृष्टमेकप्रकृतित्वम्, तथा चायं व्यक्तभेदः सुखदुःखमोहान्वितो दृश्यते, तस्मात् समन्वयदर्शनात् सुखादिभिरेकप्रकृतीदं शरीरम्' इति । एवमुक्तवाननुयुज्यते-'अथ प्रकृतिविकार इति कथं लक्षितव्यमिति' ? यस्यानवस्थितस्य धर्मान्तरनिवृत्तौ धर्मान्तरं प्रवर्त्तते सा प्रकृतिः, यच्च धर्मान्तरं प्रवर्त्तते निवर्त्तते वा स विकार इति । सोऽयं प्रतिज्ञातार्थविपर्यासादनियमात् कथां प्रसञ्जयति, प्रतिज्ञातं खल्वनेन- नासदाविर्भवति न सत्तिरोभवतीति । सदसतोश्च तिरोभावाविर्भावमन्तरेण न कस्यचित्प्रवृत्तिः प्रवृत्त्युपरमश्च भवति । मृदि खल्ववस्थितायां भविष्यति शरा- वादिलक्षणं धर्मान्तरमिति प्रवृत्तिर्भवति, अभूदिति च प्रवृत्त्युपरमः, तदेतन्मृद्धर्मा- णमापि न स्यात् । एवं प्रत्यवस्थितो यदि सतश्चात्महानमसतरचात्मलाभम- भ्युपैति तदस्यानपसिद्धान्तो निग्रहस्थानं भवति, अथ नाभ्युपैति पक्षोऽस्य न सिध्यति ॥ २४ ॥ किसी अर्थ के तथात्व ( तद्वस्तुनिष्ठितत्व ) को प्रतिज्ञात कर उस अर्थ से विपरीत अनियम से कथा-प्रसङ्ग करने वाले का 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान समझना चाहिये । जैसे कोई वादी 'सत् अपने स्वत्व को नहीं छोड़ता, सत् का नाश नहीं होता, असत् स्वरूप में नहीं रहता, असत् उत्पन्न नहीं होता।' इस सिद्धान्त को स्वीकार कर स्वपक्ष स्थापित करता हैं-'यह व्यक्त एक-प्रकृति है, विकारों में प्रकृति का सम्बन्ध देखा जाने से । मृत्तिकान्वित शरावादि लोक में एकप्रकृतिक देखे जाते हैं, तथा च-यह व्यक्तभेद ( शरीर ) सुखदुःखमोहान्वित देखा जाता है, अतः इस समन्वयदर्शन से यह शरीर- सुखादि के समन्वय से एकप्रकृति है।' ऐसा कहनेवाले इस वादी को पूछना चाहिये- 'यह प्रकृति है, यह विकार है ?'-यह भेद कैसे करें ? जिसके रहते धर्मान्तर की निवृत्ति होने पर धर्मान्तर प्रवृत्त होता है वह 'प्रकृति' होती है तथा जो धर्मान्तर प्रवृत्त तथा निवृत्त होता रहता है, वह 'विकार' कहलाता है। यों, प्रतिज्ञातार्थ के विपर्यास द्वारा वादी नियम-भङ्ग कर कथा प्रारम्भ करता है। इसने प्रतिज्ञा की थी-असत् का आविर्भाव नहीं होता, सत् का तिरोभाव नहीं होता' । सत् असत् के तिरोभाव, आविर्भाव के विना किसी की प्रवृत्ति तथा निवृत्ति नहीं होती ! मृत्तिका के रहने पर ही शरा- वादिलक्षण धर्मान्तर होगा, अतः प्रवृत्ति हो जाती है, 'था' इस तरह विनाश हो जाता है। यह स्थिति मृत्तिका के विकारों में ( उत्पाद-विनाश ) नहीं हो पायेगी। इस तरह प्रतिषेध करने पर, यदि वादी सत् का नाश तथा असत् का उत्पाद स्वीकार करता है, तो यह उसका 'अपसिद्धान्त' निग्रहस्थान हो जायेगा; यदि नहीं स्वीकार करता है तो उसका पक्ष सिद्ध नहीं होगा।

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित) · Page 397 of 410 · BharatKosha