न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context६. सू० ] प्रमाणप्रकरणम् २३ वाक्यलाघवेऽनादरः, 'तथा चाऽयम्¹' इत्यम्भूतेन वाक्यविकल्पेन प्रवृत्तः सिद्धान्ते, छले, शब्दादिषु च बहुलं समाचारः शास्त्र इति । सद्विषयं च प्रत्यक्षम्, सदसद्विषयं चानुमानम् । कस्मात् ? त्रैकाल्यग्रहणात्- त्रिकालयुक्ता अर्था अनुमानेन गृह्यन्ते-'भविष्यति' इत्यनुमीयते, 'भवति' इति च, 'अभूत्' इति च । असच्च खल्वतीत मनागतं चेति ॥ ५ ॥ (ग) उपमानलक्षणम् अथोपमानम् । प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम् ॥ ६ ॥ प्रज्ञातेन सामान्यात् प्रज्ञापनीयस्य प्रज्ञापनमुपमानमिति-'यथा गौरेवं गवयः' इति । किं पुनरत्रोपमानेन क्रियते, यदा खल्वयं गवा समानधर्मं प्रतिपद्यते तदा प्रत्यक्षतस्तमर्थं प्रतिपद्यत इति ? समाख्यासम्बन्धप्रतिपत्तिरुप- मानार्थ इत्याह । 'यथा गौरेवं गवयः' इत्युपमाने प्रयुक्ते गवा समानधर्ममर्थ- करना उन्हें अभीष्ट नहीं था, अतः ऐसे लाघव में उनका आदर नहीं है—यह दिखाने के लिये। आचार्य का ऐसा लाघव के प्रति अनादर इस शास्त्र में 'वैसा ही यह हैं' इत्यादि वाक्य-विकल्पों द्वारा सिद्धान्त, छल, शब्द आदि के वर्णन-प्रसंग में भी बहुत जगह देखा जाता है। प्रत्यक्ष केवल वर्तमानविषयक होता है, परन्तु अनुमान वर्तमानविषयक भी होता है, अतीत व अनागत विषयक भी; क्योंकि अनुमान द्वारा त्रैकालिक ज्ञान होता है। तीनों कालों से युक्त अर्थ अनुमान द्वारा ग्रहण किये जा सकते हैं, जैसे 'होगा' यह अनुमान भी हो सकता है, 'है' यह भी हो सकता है, 'था' यह भी। 'असत्' का अनुमान अतीत या अनागत विषयक ही होता है ॥ ५ ॥ इस प्रकार अनुमान का व्याख्यान कर दिया गया ॥ अब उपमान का निरूपण करते हैं— (जिससे) प्रसिद्ध (पूर्वप्रमित गवादि) के साधर्म्य (सादृश्य) ज्ञान से साध्य (गवयादि- पदवाच्य) की सिद्धि हो वह 'उपमान' प्रमाण कहलाता है ॥ ६ ॥ प्रज्ञात (प्रसिद्ध गो-आदि) के सादृश्यज्ञान से प्रज्ञापनीय (गवय-आदि) का ज्ञान जिस प्रमाण से कराया जाये—उसे 'उपमान' कहते हैं। 'जैसी गौ ऐसा ही गवय होता हैं'। प्रमाता जब गो के सदृश गवय को देखता है तो उसे प्रत्यक्ष प्रमाण से ही वह ज्ञान हो जाता है, फिर उपमान प्रमाण यहाँ क्या नई चीज ला देगा ? वाक्यार्थश्रोता समान- धर्म (सादृश्य) को प्रत्यक्ष कर गवय को देखता ही है। किसी एक शब्द की उसके अर्थ में समाख्या का परिचय होना, यही उपमान का प्रयोजन है—ऐसा सूत्रकार का अभिप्राय १. 'चायमस्य'-इति पा० ।