न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. आ० १ आ० भूतेभ्य इति। नानाप्रकृतीनामेषां सतां विषयनियमः, नैकप्रकृतीनाम्। सति च विषयनियमे स्वविषयग्रहणलक्षणत्वं भवतीति ॥ १२ ॥ भूतलक्षणम् कानि पुनरिन्द्रियकारणानि ? पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशमिति भूतानि ॥ १३ ॥ संज्ञाशब्दैः पृथगुपदेशः—विभक्तानां भूतानां सुवचं कार्यं भवि- ष्यतीति ॥ १३ ॥ (घ) अर्थ ( विषय ) लक्षणम् इमे तु खलु— गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः ॥ १४ ॥ पृथिव्यादीनां यथाविनियोगं गुणा इन्द्रियाणां यथाक्रममर्था विषया इति१ ॥ १४ ॥ (ङ) बुद्धिलक्षणम् अचेतनस्य करणस्य बुद्धेर्ज्ञानं वृत्ति चेतनस्याकर्तुरूपलब्धिरिति युक्ति- ‘भूतेभ्यः’ पद में बहुवचन इसलिये है—इन इन्द्रियों को नानाप्रकृतिक मानने पर ही इनमें विषय-नियम बनेगा, एकप्रकृतिक मानने पर नहीं । तथा विषय-नियम होने से ही इनमें स्वविषय-ग्रहण लक्षण घटेगा ॥ १२ ॥ इन इन्द्रियों की प्रकृतियाँ (कारण) क्या हैं ? १. पृथिवी, २. जल, ३. तेज, ४. वायु तथा ५. आकाश—ये ‘भूत’ (इन्द्रियकारण) कहलाते हैं ॥ १३ ॥ विशेष संज्ञाओं से भूतों का पृथक् उपदेश इसलिये किया गया है कि इस प्रकार भेदों से ज्ञात इन भूतों की प्रमिति भली भाँति हो सकेगी ॥ १३ ॥ १. गन्ध, २. रस, ३. रूप, ४. स्पर्श, तथा ५. शब्द—ये पृथिवी आदि भूतों के गुण हैं, उनके विषय (अर्थ) हैं ॥ १४ ॥ पृथिवी आदि पाँचों भूतों का यथासम्बन्ध गुण तथा इन्द्रियों का यथाक्रम विषय समझना चाहिये ॥ १४ ॥ त्रैगुण्य का विकार होने से बुद्धि स्वयम् अचेतन होती हुई भी पुरुषगत चैतन्य की छाया पड़ने के कारण चेतन की तरह आभासित होती है, उस चैतन्याभास से वह स्वयं १. एतद्भाष्यव्याख्याने वार्त्तिकतात्पर्यकारयोरुहापोहैर्विद्यते, तदभिमतव्याख्यानं तु तत्र तत्रैव द्रष्टव्यम् ।