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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० सुखवन्नित्यमिति चेत् ? संसारस्थस्य मुक्तेनाविशेषः । यथा मुक्तः सुखेन तत्संवेदनेन च सन्नित्येनोपपन्नः, तथा संसारस्थोऽपि प्रसज्यत इति; उभयस्य नित्यत्वात् । अभ्यनुज्ञाने च धर्माधर्मफलेन साहचर्यं यौगपद्यं गृह्येत । यदिदमुत्पत्ति- स्थानेषु धर्माधर्मफलं सुखं दुःखं वा संवेद्यते पर्यायेण, तस्य च नित्यं संवेदनस्य च सहभावो यौगपद्यं गृह्येत, न सुखाभावो नानभिव्यक्तिरस्ति; उभयस्य नित्यत्वात् । अनित्यत्वे हेतुवचनम् । अथ मोक्षे नित्यस्य सुखस्य संवेदनमनित्यम् ? यत उत्पद्यते स हेतुर्वाच्यः । आत्ममनःसंयोगस्य निमित्तान्तरसहितस्य हेतुत्वम् । आत्ममनःसंयोगो हेतु- रिति चेत् ? एवमपि तस्य सहकारि निमित्तान्तरं वचनीयमिति । धर्मस्य कारणवचनम् । यदि धर्मो निमित्तान्तरम् ? तस्य हेतुर्वाच्यो यत उत्पद्यत इति । योगसमाधिजन्यकार्यावसायविरोधात् प्रक्षये संवेदननिवृत्तिः१ । यदि योग- समाधिजो धर्मो हेतुः ? तस्य कार्यावसायविरोधात्प्रक्षये संवेदनमत्यन्तं निवर्तेत । सुख की तरह वह नित्य है-ऐसा कहोगे तो संसारी और मुक्त पुरुष में भेद क्या रह जायेगा ? जैसे मुक्त पुरुष नित्य सुख तथा उसके संवेदन से उपपन्न है उसी प्रकार संसारी में भी नित्य सुख मानना पड़ेगा; क्योंकि दोनों ही सुख तथा संवेदन नित्य हैं । दोनों को नित्य मानने पर, धर्म तथा अधर्म से उत्पन्न सुख-दुःख के उपलब्धिकाल में नित्य सुख तथा उसके नित्य ज्ञान का यौगपद्य (एककालसम्बद्धत्व) ग्रहण करना पड़ेगा । सुख को नित्य तथा उसकी अभिव्यक्ति को अनित्य मानने में कोई हेतु दिखाना पड़ेगा कि 'मोक्ष में नित्य सुख की अभिव्यक्ति अनित्य हैं'। ऐसी अभिव्यक्ति जिससे पैदा होती है, वह कारण बताना चाहिये । वैसी अभिव्यक्ति में अकेला आत्ममनःसंयोग तो निमित्त बन नहीं सकता, अतः उसका कोई निमित्तान्तर मानना पड़ेगा । वह निमित्तान्तर कौन है ? यह बताना चाहिए । 'धर्म ही तदपेक्षित निमित्तान्तर है'-ऐसा मानेंगे तो 'धर्म निमित्तान्तर हैं' इस में भी कोई हेतु बताना पड़ेगा, जिससे वह उत्पन्न होता हो । यदि योगसमाधिज धर्म (धर्ममेघाख्य समाधि) को उसका हेतु मानेंगे तो उस धर्म में कार्य का विरोधी रहने से सर्वक्षय हो जाता है, सर्वक्षय होने से उस सुखाभिव्यक्ति की भी अत्यन्त निवृत्ति हो जायेगी । 'संवेदनानुवृत्तिः'-इति पाठः ।