न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in contextतरस्य नोपलभे' इत्येषा बुद्धिः 'अपेक्षा' = संशयस्य प्रवर्त्तिका वर्तते, तेन विशेषा- पेक्षो विमर्शः संशयः । अनेकधर्मोपपत्तेरिति । समानजातीयमसमानजातीयं चानेकम्, तस्यानेकस्य धर्मोपपत्तेः, विशेषस्योभयथा दृष्टत्वात् । समानजातीयेभ्योऽसमानजातीयेभ्य- श्चार्था विशिष्यन्ते, गन्धवत्त्वात् पृथिवी अबादिभ्यो विशिष्यते गुणकर्मभ्यश्च । अस्ति च शब्दे विभागजन्यत्वं विशेषः। तस्मिंस्ते 'द्रव्यं गुणः कर्म वा' इति सन्देहः, विशेषस्योभयथा दृष्टत्वात् । 'किं द्रव्यस्य सतो गुणकर्मभ्यो विशेषः, आहोस्वित् गुणस्य सतो द्रव्यकर्मभ्यः?, अथ कर्मणः सतो द्रव्यगुणेभ्यः ? इति विशेषापेक्षा - 'अन्यतमस्य व्यवस्थापकं धर्मं नोपलभे' इति बुद्धिरिति । विप्रतिपत्तेरिति । व्याहतमेकार्थदर्शनम् = विप्रतिपत्तिः, व्याघातः = विरोधः, असहभाव इति । 'अस्त्यात्मा' इत्येकं दर्शनम्, 'नास्त्यात्मा' इत्यपरम्; न च सद्भावासद्भावौ सहैकत्र सम्भवतः, न चान्यतरसाधको हेतुरुपलभ्यते, तत्र तत्त्वानवधारणं संशय इति । २. अनेक धर्मोपलब्धि (उपपत्ति) से भी विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । अर्थात् समानजातीय तथा असमानजातीय विशेषक (विभेदक) धर्म सामान्य धर्म के साथ रहते हैं—इस अध्यवसाय की उपलब्धि से विशेषापेक्ष विमर्श 'संशय' कहलाता है । समानजातीय और असमानजातीय धर्मों से अर्थ विभिन्न हुए देखे जाते हैं । जैसे—पृथ्वी गन्धवती होने से समानजातीय जलादि द्रव्यों से भिन्न है, इसी प्रकार असमानजातीय गुण, कर्म से भी । शब्द में भी विभागजन्य विशेष (विभेदक धर्म) है। इस (शब्द) में— 'यह द्रव्य है, या गुण है, या कर्म है'—ऐसा सन्देह हो सकता है; क्योंकि उसका विभेदक धर्म तीनों में समानरूप से देखा जाता है। यहाँ 'क्या यह द्रव्य होता हुआ गुण, कर्म से भिन्न है' ? या 'गुण होता हुआ द्रव्य, कर्म से भिन्न है'? अथवा 'कर्म होता हुआ द्रव्य, गुण से भिन्न है' ?—ऐसी विशेषापेक्षा—'किसी एक निश्चित विभेदक धर्म को नहीं पा रहा हूँ'—यह बुद्धि होती है। ३. विप्रतिपत्ति से विशेषापेक्ष विमर्श भी संशय कहलाता है । विरुद्ध एकार्थदर्शन को 'विप्रतिपत्ति' कहते हैं। व्याघात = विरोध, एक साथ न रहना । जैसा कि 'आत्मा है' यह एक वाक्य है, 'आत्मा नहीं है'—यह दूसरा वाक्य, एक में सत्ता (होना) तथा असत्ता (न होना) दोनों एकत्र रह नहीं सकते, इनमें से किसी एक का साधक हेतु भी नहीं दिखाया गया, अतः ऐसे अवसर पर तत्त्व (यथातथ = समीचीन) का ज्ञान का न होना ही 'संशय' है । १. क्वचिन्नास्ति ।