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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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२५. सू० ] न्यायपूर्वाङ्गलक्षणप्रकरणम् ४३ यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत्प्रयोजनम् ॥ २४ ॥ यमर्थमाप्तव्यं हातव्यं वा व्यवसाय तदाप्तिहानोपायमनुतिष्ठति, प्रयोजनं तद्वेदितव्यम्; प्रवृत्तिहेतुत्वात् । 'इममर्थमाप्स्यामि हास्यामि वा' इति व्यवसायो- ऽर्थस्याधिकारः, एवं व्यवसीयमानोऽर्थोऽधिक्रियत इति ॥ २४ ॥ दृष्टान्तलक्षणम् लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः ॥ २५ ॥ १लोकसामान्यमनतीता लौकिकाः, नैसर्गिकं वैनयिकं बुद्धयतिशयमप्राप्ताः । तद्विपरीताः परीक्षकाः, तर्केण प्रमाणैरर्थं परीक्षितुमर्हन्तीति । यथा यमर्थं लौकिका बुध्यन्ते तथा परीक्षका अपि, सोऽर्थो दृष्टान्तः । दृष्टान्तविरोधेन हि प्रतिपक्षाः प्रतिषेद्धव्या भवन्तीति, दृष्टान्तसमाधिना च स्वपक्षाः स्थापनीया भवन्तीति, अवयवेषु चोदाहरणाय कल्पत इति ॥ २५ ॥ प्रमाता जिस अर्थ (वस्तु) को अनुकूल या प्रतिकूल निश्चय कर प्रवृत्त हो, उसे 'प्रयोजन' कहते हैं ॥ २४ ॥ प्रमाता जिस अर्थ को उपादेय या हेय निश्चित करके उसकी प्राप्ति या त्याग का प्रयत्न करता है, उसे 'प्रयोजन' समझना चाहिये, क्योंकि वह (प्रयोजन) प्रमाता की प्रवृत्ति का हेतु होता है । 'इस अर्थ को ग्रहण करूँगा, या छोड़ूँगा', यह निश्चित (इच्छा) ही अर्थ का अधिकार (प्रयोजन) है । इस निश्चय का विषय अर्थ अधिकार का विषय है ॥ २४ ॥ जिस अर्थ में लौकिक और परीक्षकों का बुद्धि का साम्य (अविरोध) हो वह 'दृष्टान्त' कहलाता है ॥ २५ ॥ 'लौकिक' उसे कहते हैं जिसकी बुद्धि लोकविपरीत में न जाती हो, अर्थात् ऐसे शिष्य, जिन्होंने स्वाभाविक शास्त्रमर्यादित अर्थ को समझने में बुद्धि का वैशद्य न प्राप्त किये हो । उसके विपरीत 'परीक्षक' उसे कहते हैं जिसकी बुद्धि शास्त्रपरिशीलन से प्रकृष्ट हो चुकी हो, जो कि तर्क तथा प्रमाणों से अर्थ की परीक्षा कर सकता हो । जिस अर्थ को लौकिक तथा परीक्षक पुरुष एक-सा समझते हों, वह अर्थ 'दृष्टान्त' कहलाता है । दृष्टान्तविरोध से प्रतिपक्षी को बाद में रोका जाता है तथा दृष्टान्तसमाधान से अपना पक्ष परिपुष्ट किया जाता है, और पञ्चावयवों में उदाहरण की कल्पना दृष्टान्त से ही होती है—इन सब कारणों से दृष्टान्त को 'न्यायपूर्वाङ्ग' में समाविष्ट किया है ॥ २५ ॥ १. 'लोकसाम्यम्'—इति पाठ० । लोकसामान्यम् = मौर्य्यम् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

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