न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० यस्यार्थस्य सिद्धावन्येऽर्था अनुषज्यन्ते, न तैर्विना सोऽर्थः सिद्ध्यति, तेऽर्था यदधिष्ठानाः, सोऽधिकरणसिद्धान्तः । यथा—'देहेन्द्रियव्यतिरिक्तो ज्ञाता, दर्शन- स्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्' इति । अत्रानुषङ्गिणोऽर्थाः—'इन्द्रियनानात्वम्', नियतविषयाणीन्द्रियाणि', 'स्वविषयग्रहणलिङ्गानि ज्ञातुर्ज्ञानसाधनानि', 'गन्धा- दिगुणव्यतिरिक्तं द्रव्यं गुणाधिकरणम्' 'अनियतविषयाश्चेतना' इति पूर्वार्थ- सिद्धावेतेऽर्थाः सिद्ध्यन्ति, न तैर्विना सोऽर्थः सम्भवतोति' ।। ३० ।। अपरीक्षिताभ्युपगमात् तद्विशेषपरीक्षणमभ्युपगमसिद्धान्तः ।। ३१ ।। यत्र किञ्चिदर्थजातमपरीक्षितमभ्युपगम्यते—अस्ति द्रव्यं शब्दः; स तु नित्यः, अथानित्य इति ? द्रव्यस्य सतो नित्यताऽनित्यता वा तद्विशेषः परीक्ष्यते, सोऽभ्यु- पग़मसिद्धान्तः, स्वबुद्धयतिशयचिख्यापयिषया परबुद्धयवज्ञानाच्च प्रवर्तत इति ।। ३१ ।। जिस अर्थ की सिद्धि से अन्य अर्थ अनुषक्त ( = सिद्ध, साथ लगे हुए) हों, उनके बिना वह अर्थ सिद्ध न होता हो, वे अर्थ जहाँ उपवर्णित हों, वह 'अधिकरणसिद्धान्त' कहलाता है। जैसे—'दर्शन तथा स्पर्श द्वारा एक ही अर्थ का ग्रहण होने से देहेन्द्रिय से अतिरिक्त अन्य कोई ज्ञाता है'—इस अनुमान में अनुषक्त (साथ लगे) अर्थ हैं—इन्द्रियों का नानात्व, इन्द्रियों का नियतविषयत्व, इन्द्रियों का स्वविषयग्रहणहेतु तथा ज्ञाता के लिये इन्द्रियों का ज्ञानसाधनत्व आदि और 'द्रव्य गन्धादि गुणों से अतिरिक्त है और गुणों का अधिष्ठान है', 'चेतन धर्म अनियतविषयक है'.आदि । पूर्व साक्षाद् अधिकृत अर्थ की सिद्धि होने पर ही ये अर्थ सिद्ध हो सकते हैं, इनकी सिद्धि के बिना वह अर्थ भी सिद्ध न हो पायेगा। यह परस्पर एक दूसरे को प्रमाणित करना ही 'अधिकरणसिद्धान्त' कहलाता है ।। ३० ।। जो अर्थ सूत्रों में परीक्षित न हो परन्तु शास्त्र में मिलता हो उसका विशेष परीक्षण 'अभ्युपगमसिद्धान्त' कहलाता है ।। ३१ ।। कोई ऐसा अर्थसमूह जो अपरीक्षित (सूत्र में न कहा गया या जिसकी सम्यक् परीक्षा न की गयी) हो, शास्त्र में मिल जाये उसकी विशेष परीक्षा ही 'अभ्युपगमसिद्धान्त' कह- लाती है। जैसे—'शब्द द्रव्य है, वह नित्य है या अनित्य', यहाँ शब्द की द्रव्यत्वपरीक्षा तथा द्रव्य होने पर उसकी नित्यता या अनित्यता की यह विशिष्ट सूक्ष्म परीक्षा ही 'अभ्युपगमसिद्धान्त' है। अभ्युपगमसिद्धान्त का उपयोग अपनी बुद्धि की उत्कृष्टता दिखलाने तथा प्रतिपक्षी की बुद्धि को अपकृष्टता के लिये किया जाता है ।। ३१ ।। १. अत्रार्थापत्तिमुखेनाधिकरणसिद्धान्तखण्डनाय बद्धपरिकराणां बौद्धनैयायिकानां मतं तत्खण्डनं च वार्त्तिकेऽवधेयं सुधीभिः। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri