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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० तत्प्रतिषेधेन तत्त्वाभ्यनुज्ञानार्थम्, न त्वयं साधकवाक्यैकदेश इति। प्रकरणे तु जिज्ञासादयः समर्थाः, अवधारणीयार्थोपकारात्। तत्त्वार्थसाधकभावात्तु प्रति- ज्ञादयः साधकवाक्यस्य भागा एकदेशा अवयवा इति ॥ ३२ ॥ प्रतिज्ञालक्षणम् तेषां तु यथाविभक्तानाम्— साध्यनिर्देशः प्रतिज्ञा ॥ ३३ ॥ प्रज्ञापनीयेन धर्मेण धर्मिणो विशिष्टस्य परिग्रहवचनं प्रतिज्ञा। प्रतिज्ञा¹ साध्यनिर्देशः—'अनित्यः शब्दः' इति ॥ ३३ ॥ हेतुलक्षणम् उदाहरणसाधर्म्यात् साध्यसाधनं हेतुः ॥ ३४ ॥ उदाहरणेन सामान्यात् साध्यस्य धर्मस्य साधनं प्रज्ञापनं हेतुः, साध्ये प्रति- सन्धाय धर्ममुदाहरणे च प्रतिसन्धाय तस्य साधनतावचनं हेतुः—'उत्पत्तिधर्म- कत्वात्' इति। उत्पत्तिधर्मकमनित्यं दृष्टमिति ॥ ३४ ॥ किमेतावद्धेतुलक्षणमिति ? नेत्युच्यते; किं तर्हि ? तथा वैधर्म्यात् ॥ ३५ ॥ खण्डन भी इन दोनों के खण्डन की तरह ही समझना चाहिये ।] एक प्रकरण ( कथा- प्रवृत्ति ) में ये पाँचों जिज्ञासादि अवधारणीय अर्थ के उपकारक होने से स्वरूपेण समर्थ हो सकते हैं। प्रतिज्ञादि पाँचों अवयव तो साधक वाक्य के तत्त्वार्थसाधक होने से भाग (एकदेश, अवयव) हैं। अतः सूत्रकार ने अवयव-परिगणन में इन्हीं पाँचों का ग्रहण किया है ॥ ३२ ॥ उनका विभाग करने के बाद ( प्रत्येक का लक्षण करते हैं )— वाक्य में साध्य का निर्देश 'प्रतिज्ञा' कहलाता है ॥ ३३ ॥ प्रज्ञापनीय धर्म से विशिष्ट धर्मी का परिग्राहक वाक्य 'प्रतिज्ञा' कहलाता है। अर्थात् साध्यतया स्वीक्रियमाण अर्थ का वचन 'प्रतिज्ञा' है—जैसे 'शब्दः अनित्यः' यह वचन साध्यनिर्देश है ॥ ३३ ॥ उदाहरणसादृश्य से साध्य (धर्म) का साधक 'हेतु' कहलाता है ॥ ३४ ॥ सामान्य धर्म को समझकर उदाहरण में अनुसन्धान करने के पश्चात् साध्य का साधक 'हेतु' कहलाता है। जैसे 'उत्पत्तिधर्मकत्वात्' यह हेतु है। लोक में अन्य उत्पत्ति- धर्मक प्रमेय भी अनित्य ही देखा गया है ॥ ३४ ॥ क्या हेतु का लक्षण इतना ही है ? नहीं; यह भी है— उदाहरण के असादृश्य से साध्य का साधक भी 'हेतु' है ॥ ३५ ॥ १. एतत्पदं क्वचिन्नास्ति ।