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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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३८. सू० ] न्यायप्रकरणम् ५१ न सम्भवतीत्यहेतवो हेत्वाभासाः । तदिदं हेतूदाहरणयो सामर्थ्यं१ परमसूक्ष्मं दुःखबोधं पण्डितरूपवेदनीयमिति ॥ ३७ ॥ उपनयलक्षणम् उदाहरणापेक्षस्तथेत्युपसंहारो न तथेति वा साध्यस्योपनयः ॥ ३८ ॥ उदाहरणापेक्षः = उदाहरणतन्त्रः, उदाहरणवशः । वशः = सामर्थ्यम् । साध्यसाधर्म्ययुक्ते उदाहरणे—स्थाल्यादि द्रव्यमुत्पत्तिधर्मकमनित्यं दृष्टम्, तथा 'शब्द उत्पत्तिधर्मकः' इति साध्यस्य शब्दस्योत्पत्तिधर्मकत्वमुपसंह्रियते । साध्यवैधर्म्ययुक्ते पुनरुदाहरणे आत्मादि द्रव्यमनुत्पत्तिधर्मकं नित्यं दृष्टम्, न तथा शब्द इति, अनुत्पत्तिधर्मकत्वस्योपसंहारप्रतिषेधेनोत्पत्तिधर्मकत्वमुप- संह्रियते । तदिदमुपसंहारद्वैतमुदाहरणद्वैताद्भवति । उपसंह्रियतेऽनेनेति चोपसंहारो वेदितव्य इति ॥ ३८ ॥ द्विविधस्य पुनर्हेतोर्द्विविधस्य चोदाहरणस्योपसंहारद्वैते च समानम्— सम्भव नहीं हैं; क्योंकि हेत्वाभास अहेतुक हैं । यह हेतु-उदाहरण का सामर्थ्य ( सादृश्य ) परमसूक्ष्म है, दुरवबोध है, न्यायशास्त्रज्ञ विद्वान् ही इसे समझ सकते हैं ॥ ३७ ॥ उदाहरण की अपेक्षा रखते हुए 'वैसा ही यह है' या 'वैसा यह नहीं है'—साध्य का यह उपसंहार 'उपनय' कहलाता है ॥ ३८ ॥ 'उदाहरणापेक्ष' से तात्पर्य है उदाहरणानुसारो अर्थात् उदाहरणवश । 'वश' कहते हैं 'सामर्थ्य' को । अक्षरार्थ हुआ 'उदाहरण से सामर्थ्य ( शक्ति ) पाया हुआ' । जिस प्रमाता ने साध्य के सादृश्य से युक्त उदाहरण में स्थाली-आदि द्रव्य को उत्पत्तिधर्मक होने से अनित्य देखा है, वह प्रमाता 'शब्द उत्पत्तिधर्मक है' इस अनुमान में साध्य द्रव्य का अनित्यत्वविशिष्ट शब्द में उत्पत्तिधर्मकत्व उपसंहृत कर लेता है। इसी तरह साध्य की असदृशता से युक्त उदाहरण में आत्मा-आदि द्रव्य को अनुत्पत्तिधर्मा होने से नित्य समझा है, वह नित्यत्व शब्द में नहीं है, क्योंकि अनुत्पत्तिधर्मकत्व के उप- संहारप्रतिषेध से वहाँ उत्पत्तिधर्मकत्व उपसंहृत हो जाता है । अन्वय-व्यतिरेकी रूप से उदाहरण के दो भेदों से उपसंहार के ये दो भेद हो जाते हैं । जिससे उपसंहार ( उपन्यास ) हो वह 'उपसंहार' कहलाता है ॥ ३८ ॥ दो प्रकार के हेतु कह दिये गये तथा दो प्रकार के उदाहरण और उपसंहार (उप- नय) भी बता दिये गये, उसी तरह अब दो प्रकार के निगमन का भी व्याख्यान कर रहे हैं। १. 'साधर्म्यम्'—इति पाठः।