न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context२. सू० ] कथालक्षणप्रकरणम् ६१ विज्ञायि-इत्येवमर्थं पृथक् प्रमाणतर्कग्रहणमिति ॥ १ ॥ जल्पलक्षणम् यथोक्तोपपन्नश्छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः ॥ २ ॥ यथोक्तोपपन्न इति—प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चाव- यवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहः१। छलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भ इति— छलजातिनिग्रहस्थानैः साधनम्, उपालम्भश्चास्मिन् क्रियत इति एवंविशेषणो जल्पः। न खलु वै छलजातिनिग्रहस्थानैः साधनं कस्यचिदर्थस्य सम्भवति, प्रतिषे- धार्थतैवँषां सामान्यलक्षणे विशेषलक्षणे च श्रूयते—'वचनविघातोऽर्थविकल्पो- पपत्त्या छलम्' (१. २. १०) इति, 'साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां प्रत्यवस्थानं जातिः' ( १. २. १८), 'विप्रतिपत्तिरप्रतिपत्तिश्च निग्रहस्थानम्' ( १. २. १९ ) इति । विशेषलक्षणेष्वपि यथास्वमिति । न चैतद्विजानीयात्-प्रतिषेधार्थतयैवार्थं साध- होता है। इस सब को हृदय में रखकर सूत्रकार ने 'वाद' के लक्षण में प्रमाण तथा तर्क का ग्रहण किया है ।। १ ।। उक्त वाद के लक्षणों से युक्त तथा छल, जाति, निग्रहस्थानों से स्थापना और प्रतिषेध वाले पक्ष-प्रतिपक्षों का परिग्रहक वाक्यसमूह 'जल्प' कहलाता है ॥ २ ॥ यथोक्तोपपन्न पद से वादलक्षणोक्त प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भ सिद्धान्ताविरुद्ध पञ्चावयवोपपन्न पक्ष-प्रतिपक्षपरिग्रह समझना चाहिये। छलजाति-निग्रहस्थानसाधनोपालम्भ पद से सूत्रकार कहना चाहते हैं कि छल, जाति, निग्रहस्थानों से जिस कथा में स्थापना तथा प्रतिषेध किया जाये वह 'जल्प' है। शङ्का—छल, जाति, निग्रहस्थानों से किसी अर्थ की सिद्धि नहीं होती, उलटे इनके सामान्य लक्षणों या विशेष लक्षणों में प्रतिषेधार्थता ही सुनने में आती है। जैसे—'अर्थ- विकल्पोपपादन द्वारा वचनविघात 'छल' कहलाता हैं' (१. २. १०.), 'साधर्म्य-वैधर्म्य द्वारा अर्थ का प्रतिषेध करना 'जाति' कहलाती हैं' (१. २. १८), 'अर्थ की विप्रतिपत्ति या अप्रतिपत्ति 'निग्रहस्थान' कहलाता हैं' (१. २. १९)—ये इनके सामान्य लक्षण हैं, विशेष लक्षणों में भी इसी तरह समझें। यदि यह कहें कि प्रयोक्ता को यह ज्ञात कराने के लिये कि 'प्रतिषेधार्थता से ही ये तीनों अर्थ की सिद्धि करते हैं' ये लक्षण किये हैं तो १. एतस्मिन्नर्थे वार्त्तिककारस्यारुचिः । स तु 'सिद्धान्ताविरुद्धः', 'पञ्चावयवोपपन्नः' इति वादलक्षणस्थे पदे नियमार्थे एवेत्याह ।