न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context५. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६३ अस्तु तर्हि स प्रतिपक्षहीनो वितण्डा ? यद्वै खलु तत्परप्रतिषेधलक्षणं वाक्यं स वैतण्डिकस्य पक्षः, न त्वसौ साध्यं कञ्चिदर्थं प्रतिज्ञाय स्थापयतीति । तस्माद्यथान्यासमेवास्त्विति ॥ ३ ॥ हेत्वाभासप्रकरणम् [ ४-९ ] हेतुलक्षणाभावादहेतवो हेतुसामान्याद्धेतुवदाभासमानाः । त इमे— सव्यभिचारविरुद्धप्रकरणसमसाध्यसमकालातीता हेत्वाभासाः ॥ ४ ॥ (क) सव्यभिचारलक्षणम् तेषाम्— अनैकान्तिकः सव्यभिचारः ॥ ५ ॥ व्यभिचारः = एकत्राव्यवस्थितिः¹ । सह व्यभिचारेण वर्त्तते इति सव्य- भिचारः । निदर्शनम्—'नित्यः शब्दोऽस्पर्शत्वात्, स्पर्शवान् कुम्भोऽनित्यो दृष्टः, न च तथा स्पर्शवान् शब्दः, तस्मादस्पर्शत्वान्नित्यः शब्दः' इति । दृष्टान्ते—स्पर्शवत्त्वमनित्यत्वं च धर्मौ न साध्यसाधनभूतौ दृश्येते, स्पर्शवाँ- क्यों न तब 'प्रतिपक्षहीन जल्प वितण्डा है'—इतना ही लक्षणसूत्र रखा जाये ? वितण्डावादी के परपक्षखण्डनपरक वाक्य ही औपचारिक रूप से उसका 'पक्ष' है ! हाँ, यद्यपि वह स्पष्टरूप से किसी साध्य अर्थ की प्रतिज्ञा करके अपना कोई पक्ष नहीं रखता; फिर भी किसी न किसी रूप में उसका भी प्रतिपक्ष बन ही सकता है, अतः सूत्रकारोक्त लक्षण ही उचित है ॥ ३ ॥ हेतुलक्षण न घटने से वस्तुतः जो अहेतु हों, परन्तु हेतु-सादृश्य से जिनका हेतु की तरह आभास (प्रतीति) होता हो, वे 'हेत्वाभास' कहलाते हैं। वे ये हैं— १. सव्यभिचार, २. विरुद्ध, ३. प्रकरणसम, ४. साध्यसम तथा ५. कालातीत— ये पांच 'हेत्वाभास' कहलाते हैं ॥ ४ ॥ उनमें— जो ( हेतु ) एक ही (साध्य तथा साध्याभाव) के अन्त (अधिकरण) में न रहे उसे 'सव्यभिचार' हेत्वाभास कहते हैं ॥ ५ ॥ 'व्यभिचार' से तात्पर्य है—एक जगह न रहना। व्यभिचार के साथ जो प्रवृत्त हो वह 'सव्यभिचार' कहलाता है। इसका उदाहरण—'शब्द नित्य है, अस्पर्श होने से; लोक में स्पर्शवान् घट अनित्य देखा गया है, शब्द स्पर्शवान् नहीं है अतः अस्पर्शत्वहेतु से वह नित्य है'। यहाँ दृष्टान्तस्थ स्पर्शवत्त्व अनित्यत्व हेतुओं में साध्यसाधनभाव नहीं देखा १. व्यवस्था—इति पाठ० ।