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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ० यत्र समानो धर्मः संशयकारणं हेतुत्वेनोपादीयते स संशयसमः सव्यभिचार एव। या तु विमर्शस्य विशेषापेक्षिता उभयपक्षविशेषानुपलब्धिश्च सा प्रकरणं प्रवर्तयति। यथा-- शब्दे नित्यधर्मो नोपलभ्यते, एवमनित्यधर्मोऽपि; सेयमुभय- पक्षविशेषानुपलब्धिः प्रकरणचिन्तां प्रवर्तयति। कथम् ? विपर्यये हि प्रकरण- निवृत्तेः। यदि नित्यधर्मः शब्दे गृह्येत, न स्यात्प्रकरणम् । यदि वा अनित्य- धर्मो गृह्येत, एवमपि निवर्तेत प्रकरणम् । सोऽयं हेतुरुभौ पक्षौ प्रवर्तयन्नन्य- तरस्य निर्णयाय न प्रकल्पते ॥ ७ ॥ (घ) साध्यसमलक्षणम् साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः ॥ ८ ॥ द्रव्यं छायेति साध्यम्, गतिमत्त्वादिति हेतुः साध्येनाविशिष्टः साधनीयत्वात् साध्यसमः । अयमप्यसिद्धत्वात्साध्यवत्प्रज्ञापयितव्यः । साध्यं तावदेतत्—किं पुरुषवच्छायापि गच्छति, आहोस्विदावरकद्रव्ये संसर्पति, आवरणसन्ताना- दसन्निधिसन्तानोऽयं तेजसो गृह्यत इति ? सर्पता खलु द्रव्येण यो यस्तेजो- जहां संशयकारण समानधर्म हेतुरूप से दिया गया हो वह 'संशयसम' हेत्वाभास कहलाता है, जो कि सव्यभिचार हेत्वाभास में अन्तर्भूत है । विमर्श की विशेषापेक्षित उभयपक्ष-चिन्ताओं में विशेषानुपलब्धि है वही प्रकरण को प्रवृत्त करती है । जैसे शब्द में नित्यधर्म नहीं मिलता; वैसे ही अनित्यधर्म भी नहीं मिलता—यह उभयपक्ष की विशेषा- नुपलब्धि ही प्रकरण पर समीक्षण का प्रारम्भ करती है; क्योंकि विपरीत स्थिति होने पर प्रकरण की निवृत्ति ही हो जाती है। यदि शब्द में नित्य धर्म मानोगे तो प्रकरण उठेगा नहीं, यदि केवल अनित्य धर्म मानोगे तो भी प्रकरण की निवृत्ति ही होगी। इस प्रकार, ऐसा हेतु जो दोनों पक्षों में प्रवृत्त हो सकता हो वह किसी एक तरफ का निर्णय करने में समर्थ नहीं होता ॥ ७ ॥ साध्य से अविशिष्ट ( साधनीय ) हेतु स्वयं साध्य होने से 'साध्यसम' हेत्वाभास होता है ॥ ८ ॥ 'छाया द्रव्य है, गतिमान् होने से'–इस अनुमान में 'द्रव्य छाया' साध्य है, 'गतिमत्त्व' यह हेतु साध्य से अविशिष्ट ही है; क्योंकि इसकी भी साध्य की तरह सिद्धि करनी पड़ेगी, इसलिए यह 'साध्यसम' है। अर्थात् यह हेतु भी असिद्ध है, अतः साध्य की तरह इसे भी सिद्ध करना पड़ेगा ! इस अनुमान में साध्य है—क्या पुरुष की छाया वस्तुतः चलती है, या आवश्यक द्रव्य में छिपजाती है, या यह आवरणसन्तान से तेज की असन्निधिसन्तान रूप ही तो नहीं CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri