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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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[ ७ ] मानने के कारण दार्शनिक लोग अवैदिक या वेदविरोधी संज्ञा से उद्बोधित करते हैं । और वेदानुकूल दर्शनों में हम प्रधानतः इन दर्शनों को रखते हैं—१. मीमांसा २. वेदान्त, ३. सांख्य, ४. योग, ५. न्याय, तथा ६. वैशेषिक । ‘नास्तिक’ शब्द का अर्थ दो तरह से लिया जाता है, पहला प्रामाणिक अर्थ यह है कि ‘जो परलोक को न माने’ । इस अर्थ के अनुसार चार्वाक दर्शन को छोड़कर अवशिष्ट सभी दर्शन ‘आस्तिक’ कहलाते हैं । परन्तु इस ‘नास्तिक’ का आज यह भी प्रचलित अर्थ है कि ‘जो ईश्वर को न माने’ । इस अर्थ में वे ही दर्शन ‘नास्तिक’ हैं जो अवैदिक हैं । तथा आस्तिक दर्शनों में साधारणतः हम उनकी गणना करते हैं, जिन्हें हम पहले ‘वैदिक’ कह आये हैं । वेदानुकूल दर्शनों में भी दो स्थूल भेद हैं; एक तो वे जो वेदवचन को ही एकान्ततः प्रमाण मानते हैं, दूसरे वे जो वेदों के साथ-साथ लौकिक विचारों (युक्तियों) को भी उतना ही महत्त्व देते हैं । इनमें प्रथम कोटि में मीमांसा तथा वेदान्त दर्शन का स्थान है; क्योंकि मीमांसा वेद के कर्मकाण्ड पर आधृत है तथा वेदान्त उसके ज्ञानकाण्ड उपनिषदों पर । दूसरी विचार-कोटि के दर्शन हैं, जैसे—न्याय, वैशेषिक, सांख्य तथा योग । ये वेदवचन के साथ-साथ तर्क को भी उतना ही महत्त्व देते हैं । इनमें भी न्यायदर्शन तो तर्क का सर्वाधिक आश्रय लिये हुए है । यह अपनी छोटी से छोटी या बड़ी से बड़ी बात बिना तर्क के कहना-सुनना चाहता ही नहीं । इसी लिये इसका एक दूसरा नाम ‘तर्कशास्त्र’ भी है । ‘आप्तवचन को प्रमाण’ मानने के आधार भी दर्शनों के दो भेद हैं—एक वे जो सृष्टि के मूल कारण, ईश्वर की सत्ता या स्वरूप, आत्मा की सत्ता या स्वरूप-आदि विषयों पर विचार करते समय आप्तवचन को सर्वाधिक महत्त्व देते हैं, जैसे—मीमांसा, वेदान्त आदि वैदिक दर्शन तथा जैन, बौद्ध आदि अवैदिक दर्शन । जैसे मीमांसा या वेदान्त दर्शन श्रुतिवाक्यों को ‘आप्तवचन’ के रूप में प्रयुक्त करते हैं उसी तरह बौद्ध दार्शनिक भगवान् बुद्ध को सर्वज्ञ मानते हुए उनके वचनों को आप्तवचन के रूप में प्रयुक्त करते हैं । जैनदर्शन भी अपने तीर्थङ्करों की सर्वज्ञता स्वीकार कर उनके वचन प्रमाणरूप से उपस्थित करता है । परन्तु न्याय तथा वैशेषिक दर्शनों के लिये यह बात नहीं कही जा सकती; ये दर्शन श्रुति को ‘आप्तवचन’ तो मानते हैं, किन्तु उसी को सब कुछ मान कर इसी के सहारे अपनी बात पर आग्रह नहीं करते, अपितु अपनी बात को तार्किक युक्तियों के आधार पर रखते हैं । हाँ, तार्किक युक्तियों के साथ-साथ श्रुतिवचनों को भी ये प्रमाणत्वेन उपस्थित करते हैं । यह एक बड़ा भेद है । न्यायशास्त्र नाम क्यों ? यह न्यायदर्शन ‘प्रमाण’ पर सर्वाधिक बल देता है; क्योंकि प्रत्यक्ष, परोक्ष पदार्थों के सम्बन्ध में कुछ निर्णय कर सकने का साधन एकमात्र वही है । यद्यपि यह बात कही जा सकती है कि योगियों को प्रत्यक्ष तथा परोक्ष सभी तरह का ज्ञान होता रहता है,