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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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७८ वात्स्यायनभाष्यसहित न्यायदर्शने [२. अ० १. आ०

एवमतादाम्याद्व्यवस्था न भवतीति संशयाभाव इति ॥ ४ ॥ तथाऽत्यन्तसंशयस्तद्धर्मसातत्योपपत्तेः ॥ ५ ॥ येन कल्पेन भवान् समानधर्मोपपत्तेः संशय इति मन्यते, तेन खल्वत्यन्त- संशयः प्रसज्यते, समानधर्मोपपत्तेरनुच्छेदात् संशयानुच्छेदः । न ह्ययमतद्धर्मा धर्मी विमृश्यमाणो गृह्यते, सततं तु तद्धर्मा भवतीति ॥ ५ ॥ [ सिद्धान्तपक्षः ] अस्य प्रतिषेधप्रपञ्चस्य संक्षेपेणोद्धारः— यथोक्ताध्यवसायादेव तद्विशेषापेक्षात् संशये नासंशयो नात्यन्तसंशयो वा ॥ ६ ॥ संशयानुत्पत्तिः संशयानुच्छेदश्च न प्रसज्यते । कथम् ? यत्तावत् समान- धर्माध्यवसायः संशयहेतुः, न समानधर्ममात्रमिति । एवमेतत्, कस्मादेवं नोच्यते इति ? 'विशेषापेक्षः' इति वचनात् तत्सिद्धेः । विशेषस्यापेक्षा = उसका अपने साथ तादात्म्य न होने से उनमें वह अव्यवस्था घट नहीं सकेगी, तब भी अव्यवस्था के कारण संशय कहाँ होगा ? ॥ ५ ॥ यों तो फिर सदा सर्वत्र संशय होने लगेगा; क्योंकि समानधर्मोपपत्ति तो संशय का कारण सदैव हो सकती है ॥ ५ ॥ जिस नय से आप 'समानधर्मोपत्ति से संशय होता हैं'—ऐसा मानते हैं उस नय में सदा ही संशय होता रहेगा; क्योंकि समानधर्मोपपत्ति समाप्त नहीं होगी और संशय का नैरन्तर्य भी चालू रहेगा । यह निश्चित है कि तद्धर्माभाववान् धर्मी तो कभी विमर्श का विषय नहीं बन सकेगा; क्योंकि तद्धर्म तो उसमें निरन्तर रहेगा ही । [यों इन पाँच सूत्रों से पाँच प्रकार के संशय के लक्षणों पर पूर्वपक्षी ने आपत्ति की है ।] ॥ ५ ॥ इस विस्तृत आपत्ति ( प्रतिषेध ) का संक्षेप से उद्धार ( निराकरण ) किया जा रहा है— यथोक्त (१. १. २३) समानधर्मादि के अध्यवसाय (ज्ञान) से ही उन उन पदार्थों के भेदक धर्म के ज्ञान की अपेक्षा से संशयोत्पत्ति मानने पर पूर्वोक्त असंशय या सदैव संशय नहीं होगा ॥ ६ ॥ पूर्वपक्षी द्वारा कथित संशय के अभाव, तथा संशय का अनुच्छेद (संशयनैरन्तर्य)— दोनों का ही प्रसङ्ग नहीं है; क्योंकि हमने समानधर्माध्यवसाय को संशय का हेतु कहा था, न कि समानधर्ममात्र को । ठीक है, फिर लक्षण में भी ऐसा ही क्यों नहीं पढ़ देते ? विभे- दक धर्म की आवश्यकता के बोधक 'विशेषापेक्ष' शब्द से ही समानधर्माध्यवसाय का बोध