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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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८० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० १. आ०

विशेषं नोपलभे इति, कथं नु विशेषं पश्येयं येनान्यतरमवधारयेयम्' इति । न चैतत् समानधर्मोपलब्धौ धर्मधर्मिग्रहणमात्रेण निवर्तत इति । यच्चोक्तम्—'नार्थान्तराध्यवसायादन्यत्र संशयः' इति ? यो ह्यर्थान्तरा- ध्यवसायमात्रं संशयहेतुमुपाददीत स एवं वाच्य इति । यत्पुनेरतत्—'कार्यकारणयोः सारूप्याभावात्' इति ? कारणस्य भावा- भावयोः कार्यस्य भावाभावौ कार्यकारणयोः सारूप्यम् । यस्योत्पादाद् यदुत्पद्यते, यस्य चानुत्पादान्नोत्पद्यते तत्कारणम्, कार्यमितरदित्येतत्सारूप्यम् । अस्ति च संशयकारणे संशये चैतदिति ।१ एतेनानेकधर्माध्यवसायादिति प्रतिषेधः परिहृत इति । यत्पुनरेतदुक्तम्—'विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च न संशयः' इति ? 'पृथक्प्रवादयोर्व्याहतमर्थमुपलभे विशेषं च न जानामि नोपलभे येनान्यतर- मवधारयेयम्, तत्कोऽत्र विशेषः स्याद्येनैकतरमवधारयेयम्'–इति संशयो विप्रति- पत्तिजनितः, अयं न शक्यो विप्रतिपत्तिसम्प्रतिपत्तिमात्रेण निवर्त्तयितुमिति । (विभेदक) नहीं जान पा रहा हूँ, कैसे इनका विभेदक जानूँ ताकि इन में से किसी एक की सत्ता का निश्चय कर सकूँ" यह विशेषाकांक्षा समानधर्म की उपलब्धि होने पर धर्म- धर्मी के ज्ञान मात्र से दूर नहीं हो सकती, उस दशा में संशय तो होगा ही । यह जो कहा—'अर्थान्तर रूप के संशयहेतु से स्पर्श में संशय नहीं हो सकता', तो जो अर्थान्तरज्ञानमात्र को संशयहेतु समझ रहा है, उससे ऐसा कहिये । पुनः यह जो कहा—'कार्य तथा कारण का सादृश्य न होने से संशय नहीं हो सकता', इसका उत्तर यह है कि कारण के होने या न होने पर कार्य का होना या न होना ही कार्यकारण का सादृश्य है । जिसके उत्पन्न होने से जो उत्पन्न होता हो तथा जिसके उत्पन्न न होने से उत्पन्न न होता हो वह कारण है, बाकी दूसरा कार्य है । यही सादृश्य है। यह सादृश्य संशय के कारण में तथा स्वयं संशय में रहता ही है। इसी युक्ति से पूर्वपक्षी के अनेकधर्माध्यवसायवान् कह कर जो प्रतिषेध किया था, उसका भी खण्डन हो जाता है। और यह जो पूर्वपक्षी ने कहा था—'विप्रतिपत्ति और अध्यवसाय से संशय नहीं हो सकता', उसका उत्तर यह है—" 'आत्मा हैं' तथा 'आत्मा नहीं हैं'—इन दो प्रवादों (मतों) में विरुद्ध धर्मों को पा रहा हूँ, विशेष को नहीं जान पा रहा हूँ, न मुझे मिल ही रहा है कि जिससे किसी एक के बारे में निश्चय कर सकूँ"—यह संशय विप्रतिपत्ति- जनित है, विप्रतिपत्ति या संप्रतिपत्तिमात्र कहने से वह दूर नहीं हटाया जा सकता ।

१. वार्त्तिककारस्तु सारूप्यान्तरमाह—विशेषानवधारणं सारूप्यमिति ।

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