अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त)
by ओशो (आचार्य रजनीश)
Source: अकथ कहानी प्रेम की (कबीर प्रेम गाथा एवं दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1976 (origin)
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Read in contextदेखना क्या यह लाल-पीला सा कोई खण्ड होगा? पर वह खण्ड तो, जो सब से परे, सब प्रकार से श्रेष्ठ होगा? उसका नाम ही तो एक रस तृप्त रस, जिसको न घट, जिसको घट ही न हो कभी, जिसको न घटा सके न बढ़ा सके कोई--हे परमात्मन्, तू इस अधिकार--का फल दिला ही देगा क्या? लेकिन जब कि ऐसी एक निष्ठा लेकर मनुष्य सब प्रकार उस रस रूप प्रभु पर ही सब छोड़ देता अथवा सब कुछ त्याग कर के प्रभु रूप लाल-पीले को छोड़ देता, स्वयं चिन्मात्र सत्ता रूप हो कर स्थित होजायगा तब तो सब भेद मिटने पर केवल ही हो कर सर्वव्यापक हो जायगा अथवा किसी भी तरफ से अपने को भिन्न न समझ कर सब से अपने को गिने; पर दोनों ही तरह से ही भक्त का कल्याण प्रत्यक्ष ही हो रहा है न उस को डर रहा न उस को कोई तृष्णा रही केवल यह विचार कि सब संसार का स्वामी ही सब कुछ सब तरह से कर रहा है सब ही रस दिखलायगा उस व्यापक प्रभु-सत्ता--सर्वव्यापी परमात्मा सब प्रकार भला करे, जिसको कि अनन्यनिष्ठा वाला विवेकी सब तरह अपनी रक्षा करने वाला जानता ही रहा है। भगवत्स्वरूप सब प्रकार से सब पर दया स्वाभाविक रीति से करता ही रहा है, अतः उस भक्त विवेक विचारपूर्वक भगवान् सब पर दया करते हैं यह जानकर क्यों न डरेगा! जो भगवान् की सब बात भला करने पर ही निर्भर हो कर सोचेगा ही, वह घबड़ायगा क्यों; चिन्ता से छुटकारा पा ही गया वह भक्त तो सदा भगवान् के भजन चित्त को लगा ही रखता है, भगवान् की कृपा चिन्तन विचारपूर्वक सब प्रकार से करता हुआ स्वाधीनता को ही प्राप्त होता रहता है, कभी अकेलापन सब संसार रूप समझ कर सब प्रकार से निर्भय हो कर बैठता ही रहता है, पर सोच यही तो मन में रहता है सदा ही कि हे सर्वसमर्थ तू दयालु, सर्वथा स्वतंत्र सब कुछ रूप परमात्मा ही सबका सब--कुछ कर सकता हुआ सब प्रकार भला कर रहा है जो सब कुछ देखने में आरहा, फिर मनुष्य क्यों घबड़ावे री, जब दाता ही सब प्रकार भला सब तरफ कर दिखलाने को तय्यार, फिर डर क्या पर बात तो जब मनुष्य के मन में समावे, भगवन्त रूप विचार सब अन्तःकरण में ही तो होगा? कभी चित्त को एकाग्र करके यह भी तो सोचे भगवान् सब का ही भला करते हैं; लेकिन भला ही तो सोचे विचार करे तो ही उसे ऐसा सत-भाव उस से मिल सकता अथवा प्रकाशमय कर सके ज्ञान को जो ज्ञान ही, रूप ही तो मनुष्य के जीवन का प्राण हो कर सब से परे, सब से अलग विभूति को देता, पर ज्ञान सब से श्रेष्ठ ही तो सब का सब कुछ रस देने वाला रहा है, वह अज्ञानता सब को क्यों भगावे? जो सर्वव्यापक सत्ता सर्वज्ञता रूप सब कल्याण कर सकती उस से मन के भीतर से क्यों न प्रार्थना की जाय ताकि मुक्ति लाभ सब का सब मिल सके उस का मन भी शांत हो, प्रभु शरण! पर अज्ञान को दूर करने का ज्ञान विचार प्रभु से मांग कर मनुष्य को सब प्रकार से सुखी होना, सो सब से श्रेष्ठ विचार है; भगवन्त ही दयालु सब का, जो मनुष्य पर कृपा करे, तो मनुष्य केवल ही! उस का यश सब प्रकार से सर्वत्र सब तरफ फैल जायगा और उस का, दयालु का दयाल रूप परमात्मा का ही गुण संसार में जो प्रसिद्ध होगा सब से ही सब का कल्याण सब तरह सब का सर्व प्रकार से सिद्ध साधन हो सकता ही रहा केवल ज्ञान से ही तो सब अविवेकता रूपी जो सब अविवेकता भरी सब बात जिस संसार से मनुष्य समझ रहा होगा? लेकिन मन तो जो अविवेकी, भगवान् की पर आश्रित रहकर ही मिटा ही देवे! पर जब ऐसा उत्तम विचार सब तरफ फैला हो गया होगा, फिर घबड़ावे? ज्ञान स्वयं ही मनुष्य को सब तरफ लेजा कर ऐसा परम प्रकाश स्वरूप कर सकता जिस प्रकाश रूप को ही प्रभु कह सकते हैं, जिस रूप द्वारा संसार का कल्याण, भला ही सदा... ॥ इतना कह प्रभु के चरण में वन्दना किया, प्रभु सब के सब प्रकार से मंगल का विचार करते हैं, दयालु हैं, जो पल-पल अविवेकीयों को अपने समान विचारवान् करते हुए कल्याण में, जो संसार कल्याणकारी सब का रूप है? सर्वव्यापी सत्ता का ध्यान ही सुख-सम्पदा को ही देने वाला हो सकता रहेगा; जिससे कि सारा संसार? ही तो तृप्त रूप रस से भर कर न केवल आनन्द स्वरूप आनन्दमय हो जाय विकार-वासनारहित सब मन मस्त ज्ञान रस आनन्द-रसस्वरूप 31