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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (origin)

DevanagariHindipublished322 pages

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तब राजा शूरसेन चकित होकर उस बालक को गोद में उठाकर बोले, यह आश्चर्यदायक वीर बालक तो अपने समान किसी को भी नहीं गिन रहा है, अर्थात् यह निडर वीर ... निदान उस दिन राजा शूरसेन अपने घर को जाकर सब ही बालकों को बुला कर भोजन का प्रबन्ध करवाकर उन सब को खिला कर सत्कार कर सब को विदा किया परन्तु उस बालक ने यह भोजन भी स्वीकार नहीं किया अर्थात् खाया, न सत्कार-सत्कार को ग्रहण कर प्रसन्न हुआ। राजा शूरसेन विचारता ही रहा सोच में पड़ाता रहा कि उसका पिता, या उस बालक का क्या नाम बताया जाय जब वह बालक बारह वर्ष वयवाला सब प्रकार से सबल निरोग स्वरूप वान व्यायाम करता था, तब जिस स्थान, ग्राम, नगर पाठशाला अथवा जहां कहीं जाता अथवा, कोई बलवान् मिलता था, उस समय उसके साथ बल आजमाने लगजाता था। और सब ही लोग यह कहते थे। कि इस जैसा कोई भी वीर इस पृथ्वी मण्डल मध्य है--इसलिए ही इसका नाम! पृथिवीचन्द्र रख कर सम्बोधन किया जाय। इसके पिता का नाम तो किसी पता लगाया ही नहीं था-और सम्बोधन बिना काम भी नहीं हो सकता था। इस ही लिए उसका सम्बोधन नाम ही हो गया। इसके पश्चात् किसी भी नाम से, उस बालक का पृथिवी नाम ही हो गया था। इसलिए यह विचार निश्चित है, प्रत्येक विचार प्रत्येक बात किसी कारण विशेष पर तथा किसी आवश्यकता के बल पर ही नाम रखे जाते हैं। अन्यथा व्यर्थका नाम कौन सा? और क्या नाम किसका हो? आज का विषय यह नहीं चल रहा विचार इसका नामकरण का उस दिन चला था सो इस निमित्त से कथा रूप में प्रसंग उठाया गया। अब आगे का आचरण जो पृथिवी का विवरण सुना जा रहा है। इसलिए जो जो नाम प्रख्यात हैं, वे सब किसी विशेषता के ही कारण से होते हैं। इस तथ्य को सत्य ही मान लो। अब इस कथा से यह सिद्ध हो जानेपर कि उस बालक का नाम पृथिवी रख ही लिया तो उस समय उसका आचरण जो था वह बड़ा सरल निष्कपट, दयालु तथा अपने आप-आप मग्न रहने वाला था। इसलिए जो उस समय का राजा था। अर्थात् उस समय का शूरसेन नाम सम्भ्रम राजा, या जो कोई राजा होता था, या उस देश का राजा था। उसने ही अपने मन्त्रियों से कह कर या तो वह काम करने वाले भृत्यों से कह कर उस बालक का लालन पालन करवाया था। उस का पालन तथा उस स्वरूप-रचना व शक्ति को देख कर ही; सत्कार था। सो अब तो प्रत्येक को समझना यह आवश्यक हो जाता है। जो राजा चम्पावती पति, या कोई उत्तराधिकारी था जिस समय उस बालक का लालन हो रहा था। उस देश प्रजा सुखी अवश्य थी, उस ही कारण प्रजा के भोजन की कमी अथवा दुर्भिक्ष कभी भी उत्पन्न नहीं हुआ। क्योंकि जिस राजा के मण्डल में राज्य में प्रजा सुखी नहीं होती क्या? निश्चय ही यह, राजा अपनी प्रजा के विचार को जानने वाला नहीं रहता वा प्रजाजनों क्या कुछ विचार स्वातन्त्र्य का और उनका ध्यान न रख कर केवल अपने भोग को भोगने का ध्यान ही जो राजा रखता है। वह राजा कभी भी उत्तम राजा नहीं कहा उस समय पृथिवी का नाम प्रख्यात होने का कारण यह भी हुआ कि वह बालक सबपर बड़ा दयालु था, उसने दयालुता का काम यह किया कि जो जो प्रजा में निर्बल दीन बालक थे। उन सब बालकों को इकट्ठा न करके ही अपने भोजन को या अपने लिए जो राजा मण्डल व्यवस्था से आता, उस प्राप्त सत्कार, का पृथिवी वितरण बालक-बालक बालकों को कर देता था। बालकों को वितरण करने पर सब लोग बड़े प्रसन्न और उसके यश का गान करने में प्रवृत्त हो गये। जब बालकों को दान वा सहायता देने लगा तो सबने यह निश्चय ही सम्भावना की, कि जो जो दीन बालक तथा बालिकाओं की अवस्था थी उसमें तो उन बालकों के वस्त्र भोजन का, प्रबन्ध यह राजा करता था, और राजा सब करता था, इसलिए इसका प्रभाव ऐसा पड़ा कि, सब लोग इस बात से, विशेष प्रसन्न थे, केवल राजा चिन्ता में पड़ गया, चिन्ता यह हुई पृथिवी का प्रभाव तो बढ़ जायगा यह तो निश्चित है, परन्तु सम्भवतः यह महाप्रतापी इस राज्य का स्वामी न बन जाय यह राजा के मन में भय उत्पन्न हो गया था। जब उस भय को उसने अपने मन्त्रियोंके सम्मुख प्रकट किया तब सब ही मन्त्रियोंने परामर्श दिया चिन्ताग्रस्त मत हो इस का कोई प्रबन्ध कर दिया जायगा जिससे चिन्ता मिटे। राजन्, इस पृथिवीचन्द्र बालक को तो हम मारेंगे नहीं, तो क्या करेंगे? सो आप ही सब को और पृथिवी को भी तो मार नहीं सकता अतः ऐसा उपाय हो जो पृथिवी पराजय को न पाकर के, शान्त बना रहे। इसका कारण यह भी जान लेना ही होगा 36