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क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र)

by ओशो (आचार्य रजनीश)

Source: क्रांतिबीज (बोध-कथाएँ एवं प्रेरक विचार-पत्र) · जीवन जागृति केंद्र / ओशो इंटरनेशनल · 1970 (origin)

DevanagariHindipublished73 pages

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यह प्रश्न सुनकर सेठ को गुस्सा आया ‘तू ही तो सब कुछ करा रहा?’ नौकर बोला ‘जब से मूंछें आ गई हैं तब से मैं किसी का विश्वास नहीं कर रहा हूँ और मेरा काम खूब चल रहा है। इसलिए किसी गैर-मुस्लिम से अपनी दाढ़ी मत कटाओ-मुस्लिम को रोजी-रोटी भी मिलेगी क्योंकि यहाँ पर उनका राज है। इसलिए तू मुझे मत बहका क्योंकि तू मेरा भला तो कर नहीं सकता परंतु बुरा जरूर कर देगा।’ सो जो लोग यह सोच कर अपनी स्थिति ठीक नहीं करना चाहते हैं, वह मूर्ख हैं, वह रोगी हैं; वास्तव में उनकी सोच

024/ अहंकार का त्याग किए बिना, प्रभु मिलन का आनंद दूर

हर समय यह सोचना चाहिए कि यह सारा काम भगवान् करा रहा और मैं केवल उस काम को करने का एक साधन मात्र हूँ। जब यह मान लेते हैं कि अमुक काम मैंने किया अर्थात् अहंकार आ जाता है। उस समय हम भगवान् और खुद को दो या भिन्न-दो मानते हैं। भगवान् अलग और हम अलग मानकर बैठ जाते हैं। जब हम प्रभु को और खुद को एक नहीं मानेंगे तो प्रभु का आनंद कैसे आएगा? फिर तो यही ‘कहा जाएगा तू अलग मैं अलग’ यह सोचकर ही भगवान् का आनंद लेने से हम वंचित रह जाते हैं। क्या कभी सोचा है ‘जब तक भगवान् से दूरी बनी रहेगी?’ तो फिर यही कहेंगे ‘जब तक भगवान् से दूरी बनी रहेगी, तब तक प्रभु का भी आनंद प्राप्त नहीं होगा’ हम सब प्रभु के अंश हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि प्रभु का अंश सब प्राणियों में ही है। ईश्वर-अंश को जान कर, फिर भी अहंकार करना किसी तरह ठीक नहीं है। हम भगवान् का, तो हमारे में प्रभु कैसे समाए? किस प्रकार समाए? क्या हम, या भगवान् बड़ा है? ऐसा सोचने से भगवान् का अंश समाप्त नहीं होता, केवल अहंकार पैदा होता है? इसलिए जो भगवान् को, भगवान् के स्वभाव को जान लेते हैं अर्थात् यह समझ लेते हैं कि यह काम भगवान् करा रहे हैं। प्रभु ही सारा काम करा रहे हैं तो समझो वह प्रभु का साक्षात्कार कर रहे हैं। प्रभु के अंश हैं। वह भगवान् को प्राप्त कर लेते हैं, सो अहंकार को त्याग कर प्रभु से प्रेम करो

025/ प्रभुदर्शन

‘प्रभुदर्शन कैसे हो?’ प्रभु-दर्शन! प्रभु, प्रभुदर्शन कैसे-कैसे होते हैं। प्रभु-दर्शन केवल, देखने से नहीं हो-सकते। प्रभु तो सब कुछ कर रहे हैं। प्रभुदर्शन करो, समझो हर काम को, समझो प्रभु काम कर रहे हैं। माता-पिता को, बड़ों को ‘प्रणाम’ करते समय प्रभु दर्शन करो कि प्रभु का स्वरूप प्रभु ही माता के रूप में, प्रभु ही पिता स्वरूप बनकर बैठे हैं। यही तो प्रभुदर्शन करना कहलाएगा। प्रभुदर्शन किस प्रकार से हो? किस तरह प्रभुदर्शन हो? भाई, प्रभुदर्शन केवल नाम, रूप देखने से ही समाप्त नहीं हो जाता। हर समय उनका ध्यान, प्रभुदर्शन बन कर रहा। प्रभुदर्शन केवल आँखों द्वारा ही नहीं होता है, बल्कि अपनी अंतरात्मा से भी प्रभु का अनुभव हो सकता है। मन का ध्यान उस समय प्रभु के चरणों में हो। जब अंतरात्मा के नेत्र खुलते हैं, अंतरात्मा का साक्षात्कार होने पर ही ‘प्रभु’ का दर्शन संभव होता है। अंतरात्मा ही तो ‘प्रभु’ का रूप बनकर हृदय में समाई हुई है। ‘अंतरात्मा को जानो, अपने प्रभु को जानो।’ ‘दर्शन करो, सब कुछ, प्रभु का दर्शन अंतरात्मा से, आत्मा से।’ तो प्रभुदर्शन अंत तक साथ चलता ही रहेगा। कभी न मिटने वाला यह प्रभु ‘दर्शन कैसे होगा?’ केवल यही ‘कहा गया कि प्रभु का ध्यान अंतरात्मा द्वारा प्रभु चरणों में लगा रहना चाहिए। प्रभु को याद करते-करते प्रभुमय हो जाना चाहिए, प्रभु चरणों में प्रभु को समर्पित कर देना ही प्रभु-दर्शन कहलाएगा। 19