पद्म पुराण
Padma Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context३३० * अर्चयस्व हृषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् * [ संक्षिप्त पद्मपुराण *******************************************************************************************
महामते ! इस तोतेके शरीरमें मुझे अतुलित ज्ञान प्राप्त हुआ है, जिसके प्रभावसे मैं भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंको प्रत्यक्ष देखता हूँ। यहाँ रहकर भी उसी ज्ञानके प्रभावसे मुझे सब कुछ ज्ञात हो जाता है। विप्रवर ! संसारमें भटकनेवाले मनुष्योंको तारनेके लिये गुरुके समान बन्धन-नाशकं तीर्थ दूसरा कोई नहीं है।* भूतलपर प्रकट हुए जलसे बाहरका ही सारा मल नष्ट होता है; किन्तु गुरुरूपी तीर्थ जन्म-जन्मान्तरके पापोंका भी नाश कर डालता है। संसारमें जीवोंका उद्धार करनेके लिये गुरु चलता-फिरता उत्तम तीर्थ है।†
**भगवान् श्रीविष्णु कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ ! वह परम ज्ञानी शुक महात्मा च्यवनको इस प्रकार तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर चुप हो गया। यह सब परम उत्तम जङ्गम तीर्थकी महिमाका वर्णन किया गया। राजन् ! तुम्हारा कल्याण हो ! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे वरके रूपमें माँग लो।
**वेनने कहा—**जनार्दन ! मुझे राज्य पानेकी अभिलाषा नहीं है। मैं दूसरी कोई वस्तु भी नहीं चाहता। केवल आपके शरीरमें प्रवेश करना चाहता हूँ।
**भगवान् श्रीविष्णु बोले—**राजन् ! तुम अश्वमेध और राजसूय यज्ञोंके द्वारा मेरा यजन करो। गौ, भूमि, सुवर्ण, अन्न और जलका दान दो। महामते ! दानसे ब्रह्महत्या आदि घोर पाप भी नष्ट हो जाते हैं। दानसे चारों पुरुषार्थोंकी भी सिद्धि होती है, इसलिये मेरे उद्देश्यसे दान अवश्य करना चाहिये। जो जिस भावसे मेरे लिये दान देता है, उसके उस भावको मैं सत्य कर देता हूँ।‡ ऋषियोंके दर्शन और स्पर्शसे तुम्हारी पापराशि नष्ट हो चुकी है। यज्ञोंके अन्तमें तुम निश्चय ही मेरे शरीरमें आ मिलोगे।
वेनसे यों कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये। उनके अदृश्य हो जानेपर नृपश्रेष्ठ वेन बड़े हर्षके साथ घर आये और कुछ सोच-विचारकर अपने पुत्र पृथुको निकट बुला मधुर वाणीमें बोले—'बेटा ! तुम वास्तवमें पुत्र हो। तुमने इस भूलोकमें बहुत बड़े पातकसे मेरा उद्धार कर दिया। मेरे वंशको उज्ज्वल बना दिया। मैंने अपने दोषोंसे इस कुलका नाश कर दिया था, किन्तु तुमने फिर इसे चमका दिया है। अब मैं अश्वमेध यज्ञके द्वारा भगवान्का यजन करूँगा और नाना प्रकारके दान दूँगा। फिर भगवान् विष्णुकी कृपासे उनके उत्तम धामको जाऊँगा। अतः महाभाग ! अब तुम यज्ञकी उत्तम सामग्रियोंको जुटाओ और वेदोंके पारगामी विद्वान् ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करो।'
**सूतजी कहते हैं—**वेनकी आज्ञा पाकर परम धर्मात्मा राजकुमार पृथुने नाना प्रकारकी पवित्र सामग्रियाँ एकत्रित कीं तथा नाना देशोंमें उत्पन्न हुए समस्त ब्राह्मणोंको नियन्त्रित किया। तदनन्तर राजा वेनने अश्वमेध यज्ञ किया और ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये। इसके बाद वे भगवान् विष्णुके धामको चले गये। महर्षियो ! इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे राजा पृथुके समस्त चरित्रका वर्णन किया। यह सब पापोंकी शान्ति और सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाला है। धर्मात्मा राजा पृथुने इस प्रकार पृथ्वीका राज्य किया और तीनों लोकोंसहित भूमण्डलकी रक्षा की। उन्होंने पुण्य-धर्ममय कर्मोंके द्वारा समस्त प्रजाका मनोरञ्जन किया।
यह मैंने आपलोगोंसे परम उत्तम भूमिखण्डका वर्णन किया है। पहला सृष्टिखण्ड है और दूसरा
* तार णाय मनुष्याणां संसारे परिवर्तताम्। नास्ति तीर्थं गुरुसमं बन्धच्छेदकरं द्विज॥ (१२३।५०)
† स्थलजाच्चोदकात् सर्वं बाह्यं मलं प्रणश्यति। जन्मान्तरकृतान्यापान् गुरुतीर्थं प्रणाशयेत्॥
संसारे तार णायैव जङ्गमं तीर्थमुत्तमम्। (१२३।५२-५३)
‡ यादृशेनापि भावेन मामुद्दिश्य ददाति यः॥
तादृशं तस्य वै भावं सत्यमेव करोम्यहम्। (१२३।५८-५९)