पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context११२ पञ्चदशी सुरेश्वराचार्य ने कहा कि—अद्वैतरूप आत्मतत्व को जान चुका हुआ भी यदि अभी तक यथेष्टाचारी ही है, तो फिर वह अशुचिभक्षणादि गर्हित से गर्हित काम भी करेगा ही। फिर बताओ कि विधि निषेध की आज्ञा न मानने वाले ऐसे तत्व ज्ञानियों में और कुत्तों में क्या भेद रह गया ? 'सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति संप्राप्ते हि कलौ युगे। तानुत्तिष्ठन्ति मैत्रेय शिश्नो- दरपरायणाः' कलियुग जब आयगा तब ब्रह्म की चर्चा तो बहुतायत से होगी, परन्तु उपस्थ और पेट के गुलाम बनकर करें धरेंगे कुछ भी नहीं। ऐसी शोचनीय अवस्था जिस की है वह ज्ञानी नहीं है वह तो ज्ञानिविदूषक है। ऐसे ज्ञानी से तो अज्ञानी ही अच्छे हैं। क्योंकि वे अपने दोष को स्वीकार तो करते हैं। औषध खाकर जैसे पथ्य न किया जाय ऐसे ही ब्रह्मज्ञानी हो कर यदि व्यवहार शुद्धि नहीं है, यदि दैवी संपत्ति नहीं आयी है, तो इस सूखे ब्रह्मज्ञान से क्या होना है ? प्रत्युत ऐसा ब्रह्मज्ञान घातक हो सकता है (सरकण्डे के फूल पर जैसे फल नहीं लगता इसी प्रकार ऐसे शुष्क ब्रह्मज्ञान रूपी पुष्प पर मुक्तिरूपी फल नहीं लगता) बोधात् पुरा मनोदोषमात्रात् क्लिश्नास्यथाधुना । अशेषलोकनिन्दा चेत्यहो ते बोधवैभवम् ॥५६॥ जब तक तुझे तत्वज्ञान नहीं हुआ था तब तक तो तुझे केवल काम क्रोधादि मनोदोष ही क्लेश पहुँचाया करते थे। परन्तु अब तत्वज्ञान हो जाने पर वे कामादि मनोदोष तो हैं ही, उनके साथ ही साथ अब तेरी सर्वलोकनिन्दा भी होने लगी है [कि देखो तत्वज्ञानी हो कर भी यह बुरे बुरे काम करता है] यों