पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context१३६ पञ्चदशी प्रतीति ही नहीं होनी चाहिये । विवेक [अर्थात् उपनिषदों के विचार से उत्पन्न हुआ ज्ञान] ही अविद्या का विरोधी होता है यह बातें तत्वज्ञानी में देखी जा सकती हैं । अविद्यावृतकूटस्थे देहद्वययुता चितिः । शुक्तौ रूप्यवदध्यस्ता विक्षेपाध्यास एव हि ॥३३॥ [अब क्रमप्राप्त विक्षेपाध्यास को कहते हैं]—दोनों देहों से युक्त जो चेतन है वह अविद्या से आवृत्त जो कूटस्थ है उसमें, शुक्ति में रूप्य की तरह अध्यस्त हो जाता है, बस उसी को ‘विक्षे- पाध्यास’ कहते हैं । इदमंशश्च सत्यत्वं शुक्तिगं रूप्य ईक्ष्यते । स्वयन्त्वं वस्तुता चैवं विक्षेपे वीक्ष्यतेऽन्यगम् ॥३४॥ जैसे सीप का इदं भाग तथा सत्यता [अबाधितता] दोनों ही धर्म उस में आरोपित रजत में प्रतीत होने लगते हैं, इसी प्रकार चिदाभास में भी दूसरे [कूटस्थ] की स्वयन्ता तथा वस्तुता दीख पड़ रही हैं । शुक्ति की इदन्ता [अर्थात् पुरोदेशादि से सम्बन्धित्व] तथा सत्यता [अर्थात् अबाधितत्व] जैसे आरोपित रजत में भासा करता है इसी प्रकार कूटस्थ की स्वयन्ता तथा वस्तुता भी आरोपित चिदाभास में भासने लगी हैं । नीलपृष्ठत्रिकोणत्वं यथाशुक्तौ तिरोहितम् । असङ्गानन्दताद्येवं कूटस्थेऽपि तिरोहितम् ॥३५॥ जैसे शुक्ति की नीली पीठ और त्रिकोणपना ढक गया है, इसी प्रकार कूटस्थ की असङ्गता तथा आनन्दता आदि भी तिरोहित हो गयी हैं। [यों दोनों ही अध्यासों में विक्षेपअंश की अप्रतीति हो रही है।]