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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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चित्रदीपप्रकरणम् १५९ है ] योग वाले कहते हैं कि-चेतन आत्माओं की सन्निधि में जो प्रकृति प्रवृत्त होती है उस प्रकृति को नियम में रखनेवाला 'ईश्वर' है । उसी को श्रुति में जीवों से 'पर' कहा गया है । प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेश इति हि श्रुतिः । आरण्यके संभ्रमेण ह्यन्तर्याम्युपपादितः ॥१०३॥ प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः [ श्वे० ६-१६ ] इस श्रुति में जीव से पर ईश्वर का प्रतिपादन किया गया है कि प्रधान तथा क्षेत्रज्ञों, [ जीवों ] का पालक, सत्त्वादि गुणों का ईश, किंवा नियामक है । बृहदारण्यक के अन्तर्यामि ब्राह्मण में तो बड़ी तत्परता से 'अन्तर्यामी' का उपपादन किया गया है । अत्रापि कलहायन्ते वादिनः स्वस्वयुक्तिभिः । वाक्यान्धपि यथाप्रज्ञं दाढर्यायोदाहरन्ति हि ॥१०४॥ इस ईश्वर विषय में भी वादी लोग अपनी अपनी युक्तियों से विवाद करते हैं और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार अपने मत की दृढ़ता के लिये श्रुति वाक्यों का उद्धार भी करते हैं । क्लेशकर्मविपाकै स्तदाशयैरप्यसंयुतः । पुंविशेषो भवेदीशो जीववत् सोप्यसंगचित् ॥१०५॥ अविद्या आदि पाँच क्लेशों, चारों प्रकार के कर्मों, कर्म- विपाकों तथा इन सब के संस्कारों से अस्पृष्ट रहनेवाला, जो कोई पुरुषविशेष है, वही ईश्वर है । वह भी जीव के समान ही असङ्ग और चिद्रूप है । तथापि पुंविशेषत्वाद् घटतेऽस्य नियन्तृता । अव्यवस्थौ बन्धमोक्षा वापतेतामिहान्यथा ॥१०६॥ यद्यपि वह ईश्वर असङ्गचित् है तौ भी, पुरुषविशेष होने