पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context३७२ पञ्चदशी हो] वह प्रति क्षण ब्रह्म की उपासना ही किया करे । [ इस प्रकरण के २८ वें श्लोक में यही बात संक्षेप से कही है । ] निर्गुणब्रह्मतत्त्वस्य न ह्युपास्ते रसम्भवः । सगुणब्रह्मणीवात्र प्रत्ययावृत्तिसंभवात् ॥५५॥ गुणरहित होने के कारण निर्गुण ब्रह्मतत्त्व की उपासना हो नहीं सकती है, ऐसा विचार ठीक नहीं है । क्योंकि सगुण ब्रह्म में जैसे प्रत्यय की आवृत्ति हो सकती है, वैसी आवृत्ति, इस निर्गुण ब्रह्म में भी हो ही सकती है [यों निर्गुण तत्त्व की उपा- सना संभव हो जाती है । ] अवाङ्मनसगम्यं तन्नोपास्यमिति चेत् तदा । अवाङ्मनसगम्यस्य वेदनं न च संभवेत् ॥५६॥ वाणी और मन से अज्ञेय होने के कारण वह निर्गुण ब्रह्म यदि तुम्हारी समझ में उपास्य न हो सकता हो, तो फिर यों तो वाणी और मन से अगम्य उस तत्त्व का ज्ञान भी नहीं हो सकेगा । वागाद्यगोचराकार मित्येवं यदि वेत्त्यसौ । वागाद्यगोचराकार मित्युपासीत नो कुतः ॥५७॥ यदि कहा जाय कि 'इस ब्रह्म का आकार वागादि के गोचर होने वाला नहीं है' इस रूप से उसे जान तो सकते हैं। तो हम कहेंगे कि फिर इसी [वागादि के अगोचर] रूप से ही उसकी उपासना क्यों नहीं हो सकती है ? [हम तो कहेंगे कि उस रूप से ही उसकी उपासना भी की जा सकती है ।] सगुणत्व मुपास्यत्वाद्यदि, वेद्यत्वतोऽपि तत् । वेद्यं चेल्लक्षणावृत्त्या लक्षितं समुपास्यताम् ॥५८॥