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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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[header] ध्यानदीपप्रकरणम् ३९१ [/header]

इतना अन्तर होता है कि वे काम अब तक जिस संकीर्ण दृष्टि- कोण से हो रहे थे अब उससे न होकर व्यापक दृष्टिकोण से होने लग पड़ते हैं। यों तत्व ज्ञानी लोग राज्य जैसे बड़े कामों को औरों से अच्छी तरह कर सकते हैं। ज्ञानी में लोभ आदि न रहने से उसके सभी काम आदर्श काम होते हैं।] मिथ्यात्वबुद्धया तत्रेच्छा नास्ति चेत् तर्हि मास्तु तत् । ध्यायन्वाथ व्यवहरन् यथारब्धं वसत्वयम् ॥११५॥ उन सबको मिथ्या समझ लेने के कारण, ज्ञानी को उनकी इच्छा ही न रहती हो तो न रहो। [हम तो कहते हैं कि] ज्ञानी लोग अपने प्रारब्ध के अनुसार, चाहें तो ध्यान करते रहें या फिर व्यवहार में लगे रहें। उपासकस्तु सततं ध्यायन्नेव वसेद्, यतः ! ध्यानेनैव कृतं तस्य ब्रह्मत्वं विष्णुतादिवत् ॥११६॥ उपासक लोगों को तो सदा ध्यान में ही लगे रहना चाहिए। क्योंकि उपासक तो ध्यान के प्रताप से ही ब्रह्मता को पाता है। उपासक की ब्रह्मता प्रमाणों से समझ में नहीं आती। जैसे कि ध्यान के प्रताप से ही अपने में जो विष्णुता संपादित होती है वह पारमार्थिक विष्णुता नहीं होती। [उसे तो केवल ध्यान से ही क़ायम रखना पड़ता है।] ध्यानोपादानकं यत्तद्ध्यानाभावे विलीयते । वास्तवी ब्रह्मता नैव ज्ञानाभावे विलीयते ॥११७॥ जो बात ध्यान से ही उत्पन्न हुई है, वह तो ध्यान के न रहने पर विलीन हो ही जायगी। परन्तु ब्रह्मता ऐसी नहीं होती है। वह तो वास्तव होती है। इस कारण उस ब्रह्मता को जानने