पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in contextब्रह्मानन्दे योगानन्दप्रकरणम् ४१९ ही फांसा खुल सकता है । क्लेशों के नष्ट हो जाने पर फिर जन्म लेना नहीं पड़ता । तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय (श्वे. ३-८) इस श्रुति में कहा है कि उस पूर्वोक्त परमात्मा को जानने वाला ही इस मृत्यु रूपी संसार को अतिक्रमण कर जाता है । अर्थात् आत्मज्ञान के सिवाय मुक्ति का दूसरा कोई भी साधन नहीं है । ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः क्षीणैः क्लेशैर्जन्म- मृत्युप्रहाणिः (श्वे. १-११) इस श्रुति में कहा गया है कि— देव अर्थात् स्वप्रकाश ब्रह्मात्मा को जो कोई जान लेता है किंवा अपरोक्षरूप से अनुभव कर लेता है फिर उसके काम क्रोध आदि सभी पाशों की हानि हो जाती है । जब उसके रागादि क्लेश क्षीण हो जाते हैं तब फिर उसके जन्म और मृत्यु भी नहीं होते । क्योंकि नष्ट हुए रागादि अगला जन्म दिलाने वाले कर्मों को उत्पन्न ही नहीं कर सकते। यों परलोक के न रहने पर इस आत्मज्ञान से जैसे इस लोक के अनिष्ट नष्ट होते हैं, इसी तरह परलोक के अनिष्ट भी मर जाते हैं । देवं मत्वा हर्षशोकौ जहात्यत्रैव धैर्यवान् । नैनं कृताकृते पुण्यपापे तापयतः क्वचित् ॥६॥ धीर पुरुष देव को जानकर इसी जन्म में और इसी लोक में हर्ष शोक करना छोड़ देता है । किये और बेकिये पुण्य पाप फिर इसे कभी भी दुःखी नहीं करते । ‘अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति’ (कठ. १-२-१२) इस श्रुति में कहा गया है कि—धैर्य अर्थात् ब्रह्म- चर्य आदि साधनों से सम्पन्न पुरुष, चिदानन्दरूपी देव को जान