पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context५१४ • पञ्चदशी का कारण यह है कि--जब तक अव्यक्त अवस्था रहती है, तब तक उसे 'शक्ति' कहते हैं। जब व्यक्तावस्था आ जाती है तब उसी का 'घट' नाम पड़ जाता है। ऐन्द्रजालिकनिष्ठापि माया न व्यज्यते पुरा । पश्चाद् गन्धर्वसेनादिरूपेण व्यक्तिमाप्नुयात् ॥३७॥ ऐन्द्रजालिक में रहने वाली माया भी मणिमन्त्रादि का प्रयोग करने से पहले पहले व्यक्त नहीं होती। पीछे से तो गन्धर्व सेना आदि के रूप से प्रकट हो जाया करती है [इससे यह समझ लो कि माया पहले अप्रकट रहती है और पीछे से प्रकट हो जाती है।] एवं मायामयत्वेन विकारस्यानृतात्मताम् । विकाराधारमृद्वस्तुसत्यत्वं चाब्रवीच्छ्रुतिः ॥३८॥ 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’(छा० ६-४-१) इस श्रुति ने इसी सब विचार को लेकर मायामय [अर्थात् माया का कार्य] होने से, विकार [अर्थात् कार्यों] को तो अनृत [मिथ्या] कहा है तथा घटादि विकारों के आधार मिट्टी की ही सत्यता का वर्णन किया है। वाङ्निष्पाद्यं नाममात्रं विकारो,नास्य सत्यता । स्पर्शादिगुणयुक्ता तु सत्या केवलमृत्तिका ॥३९॥ ‘वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्’(छा०६-४-१) इस श्रुति ने कहा है कि ये जितने कार्य दीख रहे हैं ये सब वाणी से बोले जान वाले नाम ही नाम तो हैं। ये घटादि कार्य सत्य नहीं हैं (नाम के सिवाय इनका पारमार्थिक रूप कुछ भी