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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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५२२ पञ्चदशी तर्हि कारणविज्ञानात् कार्यज्ञानमितीरिते । मृद्बोधान्मृत्तिका बुद्धेत्युक्तं स्यात् कोऽत्र विस्मयः ॥५७॥ पूर्वपक्षी पूछता है कि—'कारण [मिट्टी आदि] के ज्ञान से कार्य का [अर्थात् कार्य में जो मिट्टी आदि सत्य भाग है उस का ] ज्ञान हो जाता है' ऐसा कहने पर तो तुमने दूसरे शब्दों में यही बात [लौट फेर कर] कही कि—मिट्टी के बोध से मिट्टी का बोध हो जाता है । फिर बताओ कि तुमने विस्मय करने वाली नयी बात कौनसी कही । [यह तो तुम्हारा केवल शाब्दिक चमत्कार ही हुआ आर्थिक नहीं] । सत्यं कार्येषु वस्त्वंशः कारणात्मेति जानतः । विस्मयो मास्त्विहाज्ञस्य विस्मयः केन वार्यते ॥५८॥ इसका उत्तर यह है कि—कार्य घटादियों में जो वास्तव अंश है, वह कारणस्वरूप ही हे, ऐसा जो लोग जानते हैं, उन लोगों को विस्मय भले ही न हो । परन्तु जो अज्ञ हैं, जिन्हें तत्व ज्ञान नहीं है, उनको इस बात से जो विस्मय होता है, उसे कौन हटा सकता है ? आरम्भी परिणामी च लौकिकश्चैककारणे । ज्ञाते सर्वमिति श्रुत्वा, प्राप्नुवन्त्येव विस्मयम् ॥५६॥ आरम्भी [जो समवायी असमवायी और निमित्त कारणों से भिन्न कार्य को उत्पन्न हुआ मानते हैं] परिणामी [जो पूर्व- रूप का त्याग करके रूपान्तर की प्राप्ति रूपी परिणाम को मानते हैं] तथा लौकिक [जो इन दोनों प्रक्रियाओं को नहीं जानते केवल लोक व्यवहार में लिपटे पड़े हैं] ये तीनों ही जब यह सुनते हैं कि एक कारण के परिज्ञान से अनेक कार्यों का ज्ञान