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पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

by स्वामी विद्यारण्य

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)

DevanagariSanskritpublished726 pages

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१०४ पञ्चदशी

नहीं चाहता। क्या कोई भी इस प्रेम को बालक के लिए किया हुआ प्रेम कह सकेगा ? पिता का यह प्रेम स्पष्ट ही एकपक्षीय प्रेम है। यह तो अपनी तुष्टि के लिए ही किया गया है। जिस जड रत्न को कुछ भी इच्छा नहीं है, उसकी जब यत्न से रक्षा की जाती है तब इस प्रेम को भी तो स्वार्थ ही समझ लो। क्या कोई इस प्रेम को रत्नार्थ प्रेम कह सकता है ? बैल नहीं चाहता कि मैं बोझ ढोऊँ। हमने उसे ज़बरदस्ती इस काम के लिए क़ैद कर रक्खा है। उस बैल पर हम प्रेम करते हैं। क्या इस प्रेम को कोई बैल के लिए किया हुआ प्रेम कह सकेगा। यह प्रेम तो स्पष्ट ही हमारे लिए है। ब्राह्मणत्वमूलक पूजा से जब हमें प्रसन्नता होती है तब यह सन्तुष्टि ब्राह्मण जाति की नहीं स्वयं अपनी ही होती है। जब हम स्वर्ग या ब्रह्मलोक को पाना चाहते हैं तब हमारा उद्देश्य इन लोकों का उपकार करना नहीं होता। किन्तु अपना भोग ही उसका लक्ष्य होता है। हम विष्णु आदि देवताओं की पूजा अपने पापनाश के लिए करते हैं। निष्पाप देवताओं को तो उसकी कुछ दर्कार ही नहीं होती। यह तो स्वार्थ के लिए ही की जाती है। 'हम व्रात्य् न हो जायँ' इसी उद्देश्य से तो हम वेदों को पढ़ते हैं, वेद तो व्रात्य हो ही नहीं सकते । स्थान, तृषा, पाक, शोषण और अवकाश की आवश्यकता होती है इसी से तो हम पांचों भूतों को चाहते हैं। यहाँ भी हमारा स्वार्थ (मतलब) ही मुख्य होता है। कहाँ तक कहते जायें, सभी कुछ अपने मतलब से प्रिय होता है। जब सब कामों में अपनी ही प्रधानता है तब यह हमारा स्पष्ट कर्त्तव्य हो जाता है कि हम अपने आपे के बारे में ही बुद्धि को दृढ़ कर डालें। अब प्रश्न होता है कि—यह उपर्युक्त आत्मप्रेम कैसा है ?