पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context११६ पञ्चदशी
अग्नि में दाहशक्ति, आकाश में शून्यशक्ति का विकास हो गया है। बहुत कहां तक कहें अण्डे में महासर्प की तरह यह जगत् आत्मा में छिपा बैठा है। छोटे वटबीज में फल पत्र पुष्प शाखा विटप और मूल सहित इतना बड़ा वृक्ष जैसे रहता है ऐसे ही यह समस्त त्रिभुवन अपने ब्रह्मबीज में रहता है। भूमि में बहुत से बीज पड़े रहते हैं परन्तु वे सब एक साथ जम कर खड़े नहीं हो जाते। किंतु किसी देश और किसी ऋतु में किसी किसी बीज से अंकुर निकल पड़ते हैं। हे राम ! वह आत्मा सर्वत्र विद्यमान है, नित्य प्रकाशमान् है—वह देश या काल या वस्तु की मर्यादा में बंधने कभी नहीं आता। परन्तु जब वही आत्मतत्व मननशक्ति को धार लेता है तब बस उस समय उसे 'मन' कहने लगते हैं। मन के बनते ही 'बन्ध' और 'मोक्ष' की कल्पना जाग कर खड़ी हो जाती है। उसके बाद पर्वत, 'नगर, नदी, समुद्रादि प्रपंच जिसे भुवन भी कहते हैं बनकर तैयार हो जाते हैं। असल में तो इस त्रिभुवन रूपी भवन की नींव कल्पना ही है, परन्तु तौ भी क्या करें प्राणियों के हृदय में तो यह ऐसी जम गयी है कि कुछ कहते ही नहीं बनता। छोटे बच्चों के विनोद के लिए कोई कुत्ते बिल्ली की झूठी कहानी उन्हें सुना दी जाय और वे उसे सच्ची मानकर आपस में व्यवहार करने लगें—एक दूसरे को सुनाने लगें—वैसी ही अवस्था इन प्राणियों की हो गयी है। कुत्ते बिल्ली की जो कहानी बालकों को सुनादी जाती है वे जैसे उसे ही ठीक मान बैठते हैं, ऐसे ही, विचार करने का' सामर्थ्य जिन में नहीं होता, उन के मन में इस संसाररचना के सच होने के भ्रामक विचार जमकर बैठ गए हैं। इस जगत् को बनाने वाली यह शक्ति अपने कार्य और अपने आश्रय दोनों से ही विलक्षण होती है ! क्योंकि कार्य के धर्म