पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
by स्वामी विद्यारण्य
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (origin)
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Read in context८० पंचदशी इस कारण बोध के अनुभव को तो अवश्य ही मानना पड़ता है]। जिह्वा मेऽस्ति न वेत्युक्ति र्लज्जायै केवलं यथा। न बुध्यते मया बोधो बोद्धव्य इति तादृशी ॥२०॥ ("मेरे जिह्वा है या नहीं" यह कहना जैसे केवल लज्जा के लिये ही होता है [ऐसा कहने वाला मूर्ख समझा जाता है। उस को कोई भी बुद्धिमान् नहीं मान सकता] क्योंकि जिह्वा के बिना तो भाषण ही नहीं हो सकता। ठीक इसी प्रकार 'मैं बोध को अब तक नहीं जानता, उस बोध को तो मुझे अभी जानना है' (यह कथन भी वैसा ही) लज्जाजनक है।) क्योंकि बोध के बिना तो यह बात भी नहीं कही जा सकती है। यस्मिन्यस्मिन्नस्ति लोके बोधस्तत्तदुपेक्षणे। यद् बोधमात्रं तद्ब्रह्मेत्येवंधीर्ब्रह्म निश्चयः ॥२१॥ लोक में जिन घटादि नाम वाले विषयों का ज्ञान होता है, उन उन विषयों की उपेक्षा किंवा अनादर कर देने पर [घटादि सभी पदार्थों में अनुस्यूत] जो केवल ज्ञानरूप एक स्फूर्ति [शान्त भाव से विराजती हुई] दीखने लगती है वही ब्रह्म तत्व है, ऐसा यदि किसी की बुद्धि को पता चल जाय, तो हम इसी को 'ब्रह्मनिश्चय' कहते हैं [हम समझते हैं कि ऐसा निश्चय कर लेने वाले को ब्रह्मज्ञान हो चुका है]। पञ्चकोशपरित्यागे साक्षिबोधावशेषतः। स्वस्वरूपं स एव स्याच्छून्यत्वं तस्य दुर्घटम् ॥२२॥ अन्नमयादि पांचों कोशों का परित्याग जब हम कर देते हैं,