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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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भाषाटीकासमेतम्। (१११) एकं भूमिपतिः करोति सचिवं राज्ये प्रमाणं यदा तं मोहाच्छ्रयते मदः स च मदादास्येन निर्विद्यते । निर्विण्णस्य पदं करोति हृदये तस्य स्वतन्त्रस्पृहा स्वातन्त्र्यस्पृहया ततः स नृपतेः प्राणेष्वपि द्रुह्यते ॥२६३॥ जिस समय राजा एकही मन्त्रीको राज्यमे प्रमाण करता है, तब उसको मोहसे मद प्राप्त होता है, वह मदसे दास्यतासे निर्वेदताको प्राप्त होता है, निर्वेदताको प्राप्त हुए मनुष्योके हृदयमें स्वतन्त्रताकी इच्छा प्रवेश करती है और उस इच्छासे मन्त्री राजाको प्राणोंसेभी अलग कर देता ॥ २६३ ॥ तत् किमत्र युक्तम्” इति। पिंगलकोऽपि चेतनां समासाद्य कथमपि तमाह-“दमनक ! सञ्जीवकस्तावत् प्राणसमो भृत्यः स कथं ममोपरि द्रोहबुद्धिं करोति?”। दमनक आह-- “देव ! भृत्यो भृत्य इति अनैकान्तिकमेतत् । उक्तञ्च-- सो यहा क्या युक्त है”! पिंगलकभी चेतनाको प्राप्त होकर उससे बोला - “दमनक ! सजीवक तो मेरा प्राणोकी समान प्रिय भृत्य है वह किस प्रकार मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि होगा?”। दमनक बोला-“देव भृत्य सदा भृत्य नहीं हो सकता । कहा है- न सोऽस्ति पुरुषो राज्ञां यो न कामयते श्रियम् । अशक्ता एव सर्वत्र नरेन्द्रं पर्युपासते ॥ २६४ ॥ " राजाके यहा वह पुरुष नहीं है जो लक्ष्मीकी इच्छा न करे सर्वत्र अशक्त होकर पुरुष राजाकी उपासना करते हैं ॥ २६४ ॥” पिंगलक आह--“भद्र ! तथापि मम तस्योपरि चित्तवृत्तिर्न विकृतिं याति । अथवा साधु चेदमुच्यते- पिंगलक बोला,-“भद्र ! तोभी मेरी उसके ऊपर चित्तवृत्ति विकारको नहीं प्राप्त होती । अथवा ठीक कहा है-- अनेकदोषदुष्टोऽपि कायः कस्य न वल्लभः । कुर्वन्नपि व्यलीकानि यः प्रियः प्रिय एव सः ॥ २६५ ॥” अनेक दोषोंसे दूषित होकरभी अपना शरीर किसको प्यारा नहीं है जो अपने संग अनुचित बर्ताव करके प्रिय हो वही प्रिय है-॥ २६५ ॥ ”