पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । (११७) जो जिह्वाकी तृष्टि देनेवाला कर्म लोकमे नहो तो कोई किसीका भृत्य वा वशीभूत न होता ॥ २७८ ॥ यदसत्यं वदेन्मर्त्यो यद्वासेव्यञ्च सेवते । यद्गच्छति विदेशञ्च तत्सर्वमुदरार्थतः ॥ २७९ ॥ जो मनुष्य असत्य कहता है वा असेव्यको सेवन करता है वा जो विदेशको जाता है वह सब उदरहीके निमित है ॥ २७९ ॥ तत् मया गृहागतेन बुभुक्षया पीड्यमानेन त्वत्सकाशाद्भो- जनमर्थनीयं तन्न त्वया एकाकिन्या अस्य भूपतेः रक्त- भोजनं कर्तुं युज्यते”। तच्छ्रुत्वा मन्दविसर्पिणी आह-“भो मत्कुण ! अहमस्य नृपतेर्निद्रावशं गतस्य रक्तमास्वादयामि, पुनस्त्वम् अग्निमुखः चपलश्च, तत् यदि मया सह रक्तपानं करोषि तत्तिष्ठ । अभीष्टतरं रक्तमास्वादय” । सोऽब्रवीत्,- “भगवति ! एवं करिष्यामि, यावत्त्वं न आस्वादयसि प्रथमं नृपरक्तं तावत् मम देवगुरुकृतः शपथः स्याद् यदि तत् आ- स्वादयामि”। एवं तयोः परस्परं वदतोः स राजा तच्छयन- मासाद्य प्रसुप्तः । अथ असौ मत्कुणो जिह्वालौल्यप्रकृष्टोत्सु- क्यात् जाग्रतमपि तं महीपतिमदशत् । अथवा साधु चेदमुच्यते- सो घरमें आये हुए भूखसे पीडित मुझे आपसे केवल भोजनकी इच्छा है, सो इकलेही तुमको इस राजाका रक्त भोजन करना मुनासिव नहीं है”। यह सुनकर मन्दविसर्पिणी बोली,-“भो खटमल ! मैं निद्राको प्राप्त हुए इस राजाका रक्तपान करती हूं तू अग्निमुख और चपल है, सो यदि मेरे साथ रक्तपान करेगा तो स्थितहो, यथेष्ट रक्तको आस्वादन करना” । वह बोला-“भगवति ! ऐसाही करूंगा, जबतक तू पहले राजाका रक्त नहीं आस्वादन करेगी, तबतक मुझे देव गुरुकी शपथ है, यदि मै आस्वादन करूं”। इस प्रकार उन दोनोके परस्पर कहनेमें वह राजा खाटपर आनकर सोगया । तब यह खटमल जिह्वाकी चंचलता और बडी उत्कठासे जागते ही हुए उस राजाको काटता भया । अथवा सत्य कहा है-