पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in context(२) पञ्चतन्त्रम् । सकलार्थशास्त्रसारं जगति समालोक्य विष्णुशर्मेदम् । तन्त्रैः पञ्चभिरेतच्चकार सुमनोहरं शास्त्रम् ॥ ३ ॥ इस प्रकार विष्णुशर्माने इस जगत्में सम्पूर्ण अर्थशास्त्रका सार देखकर पंच- तंत्रोंमे यह मनोहर शास्त्र निर्माण किया है ॥ ३ ॥ तद्यथा अनुश्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारो- प्यं नाम नगरम् । तत्र सकलार्थिकल्पद्रुमः प्रवरमुकुटमणि- मरीचिमञ्जरीचर्चितचरणयुगलः सकलकलापारंगतोऽमरश- क्तिर्नाम राजा बभूव । तस्य त्रयः पुत्राः परमदुर्मेधसो बहुश- क्तिरुग्रशक्तिरनन्तशक्तिश्चेतिनामानो बभूवुः । अथ राजा तान् शास्त्रविमुखान् आलोक्य सचिवान् आहूय प्रोवाच- “भो ! ज्ञातमेतद्भवद्भिः यन्ममैते पुत्राः शास्त्रविमुखा विवेक- रहिताश्च । तत् एतान् पश्यतो मे महदपि राज्यं न सौख्य मावहति । अथवा साध्विदमुच्यते- सो ऐसा सुना है कि, दक्षिणके देशमें एक महिलारोप्यनाम नगरहै । वहां सम्पूर्ण याचकोंके ( मनोरथ पूर्ण करनेको ) कल्पवृक्ष, बडे बडे निर्जित राजा- ओंकी मुकुटमणियोँकी किरणोंके समूहसे पूजित चरणयुगल, सम्पूर्ण कलाओंका पारगामी, अमरशक्ति नाम राजा था, उसके तीन पुत्र अतिदुर्बुद्धि--बहुशक्ति, उग्रशक्ति, अनन्तशक्ति नामवाले थे । तब राजा उनको शास्त्रसे विमुख देखकर मन्त्रियोंको बुलाकर बोला--“क्या यह आपको विदित है कि, जो यह मेरे पुत्र शास्त्रसे विमुख विवेक रहित हैं । सो इनको देखकर मुझको यह वडा राज्य सुख नहीं देता है । अथवा किसीने यह अच्छा कहा है कि- अजातमृतमूर्खेभ्यो मृताजातौ सुतौ वरम् । यतस्तौ स्वल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत् ॥ ४ ॥ न हुए, होकर मरगये और मूर्ख इन ( तीन प्रकारके ) पुत्रोंमे नहुए और होकर मरगये भले हैं, कारण कि, वे दोनों थोडे दुःखके निमित्त है, मूर्ख तो जन्मपर्यन्त जलाता है ॥ ४ ॥ वरं गर्भस्रावो वरमृतुषु नैवाभिगमनं वरं जातप्रेतो वरमपि च कन्यैव जनिता ।