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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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भाषाटीकासमेतम् ! ( ५ ) ष्यामि । तल्लिख्यतामद्यतनो दिवसः । यदि अहं षण्मासा- भ्यन्तरे तव पुत्रान् नयशास्त्रं प्रति अनन्यसदृशान् न करि- ष्यामि ततो नार्हति देवो देवमार्गं सन्दर्शयितुम्” । अथासौ राजा तां ब्राह्मणस्यासंभाव्यां प्रतिज्ञां श्रुत्वा ससचिवः प्रहृष्टो विस्मयान्वितः तस्मै सादरं तान् कुमारान् समर्प्य परां निर्वृतिमाजगाम । विष्णुशर्म्मणापि तानादाय तदर्थं मित्र- भेद-मित्रप्राप्ति-काकोलूकीय-लब्धप्रणाश-अपरीक्षितका- रकाणि चेति पञ्च तन्त्राणि रचयित्वा पाठितास्ते राजपुत्राः। तेऽपि तानि अधीत्य मासषट्केन यथोक्ताः संवृत्ताः । ततः प्रभृति एतत्पञ्चतन्त्रकं नाम नीतिशास्त्रं बालावबोधनार्थं भूतले प्रवृत्तम् । किं बहुना । सो यहा एक विष्णुशर्मा नाम ब्राह्मण सब शास्त्रका पारगामी विद्यार्थियोंमें प्राप्त यशवाला है, उसके निमित्त इन पुत्रोंको समर्पण करदो वह अवश्य शीघ्र इनको ज्ञानवान् करदेगा”। वह राजा यह वचन सुन विष्णुशर्माको बुलाकर बोला-“भगवन् ! मुझपर कृपाकर इन मेरे पुत्रोंको अर्थशास्त्रमें शीघ्रही असा- धारण जैसे बनै तैसे करो । तो मै तुमको सौ सख्याक सम्भत् दूंगा”। तब विष्णुशर्मा उस राजासे कहने लगा-“देव ! मेरा सत्य वचन सुनो, मैं सम्पत्से विद्याविक्रय नहीं करताहू, परन्तु इन तुम्हारे पुत्रोंको यदि छः महीनेमे नीति- शास्त्रका ज्ञाता न करू तो अपना नाम त्यागनरूरू । बहुत कहनेसे क्या है मेरा यह सिहवद्गर्जन सुनो धनकी इच्छामे मैं नहीं कहताहूं । मुझ अस्सी वर्षके सब इन्द्रियोंके भोग्यसे निस्पृह हुएको अर्थसे कुछ प्रयोजन नहीं है, परन्तु तुम्हारी प्रार्थना सिद्धिके निमित्त सरस्वती विनोद करूगा । सो आजका दिन लिखिये जो मैं छः महीनेमें तुम्हारे पुत्रोको विद्यामें असाधारण ( जिसके वरावर कोई नहो) न करू तो जगदीश्वर मुझको देवमार्ग (स्वर्ग) न दिखावै”। तब यह राजा इस ब्राह्मणकी असम्भाव्य (असम्भावसी ) प्रतिज्ञाको सुनकर, मन्त्रियों सहित प्रसन्न हो, विस्मयको प्राप्त हुआ । उसके निमित्त आदरसे उन कुमारोंको. समर्पणकर, अत्यन्त सतोषको प्राप्त हुआ । विष्णुशर्म्मानेभी उनको ले उनके निमित्त मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलूकीय, लब्धप्रणाश, अपरीक्षितकारक इन पाच