पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । (७) रात्रीमे खाटमें लेटेहुए चिन्ता उत्पन्न हुई; कि "बहुत धन उत्पन्न होनेपरभी धनप्राप्तिका उपाय चिन्ता करना चाहिये कहाभी है- न हि तद्विद्यते किञ्चिद्यदर्थेन न सिद्धयति । यत्नेन मतिमाँस्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत् ॥ २ ॥ ऐसी कोई वस्तु नही जो अर्थसे सिद्ध न होती हो इस कारण बुद्धिमान् यत्नसे अर्थका उपार्जन करे ॥ २ ॥ यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः । यस्यार्थाः स पुमांल्लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः ॥ ३ ॥ जिसके धन है उसके मित्र हैं, जिसके धन है उसके बंधु हैं, जिसके धन है लोकमे वही पुरुष है, जिसके धन है वही पंडित है ॥ ३ ॥ न सा विद्यां न तद्दानं न तच्छिल्पं न सा कला । न तत्स्थैर्य्यं हि धनिनां याचकैर्यन्न गीयते ॥ ४ ॥ न वह विद्याहै, न वह दान है, न वह कारीगरी है, न वह कला है, न वह धनियोंकी स्थिरता है, जिसको याचक न गाते हो ॥ ४ ॥ इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते । स्वजनोऽपि दरिद्राणां सर्वदा दुर्जनायते ॥ ५ ॥ इस लोकमें धनियोंके गैरभी स्वजन होजाते हैं, दरिद्रोंके कुटुम्बी भी सदा दुर्जन होजाते हैं ॥ ५ ॥ अर्थेभ्योऽपि हि वृद्धेभ्यः संवृत्तेभ्यस्ततस्ततः । प्रवर्त्तन्ते क्रियाः सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ६ ॥ धनके बढनेसे और इधर उधर इकट्ठे होनेसे सब क्रिया प्रवृत्त होती हैं, जैसे पर्वतोसे नदिया (निकल कर सब कार्य पूर्ण करती हैं) ॥ ६ ॥ पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्योऽपि गम्यते । वन्द्यते यदवन्द्योऽपि स प्रभावो धनस्य च ॥ ७ ॥ अपूज्यभी (धनसे) पूजित होता है, अगम्यकें निकटभी जाया जाता है, अनमस्कारी पुरुषभी वन्दन योग्य होता है, यह प्रभाव धनकाही है ॥ ७ ॥ अशनांदिन्द्रियाणीव स्युः कार्याण्यखिलान्यपि । एतस्मात्कारणाद्वित्तं सर्वसाधनमुच्यते ॥ ८ ॥