पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । (२१९) न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत् । विश्वासाद्भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥ ४५ ॥ अविश्वासीका विश्वास न करे, विश्वासीकाभी बहुत विश्वास न करे, कारण कि, विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय मूलसहित नष्ट कर देता है ॥ ४५ ॥ न बध्यते ह्यविश्वस्तो दुर्बलोऽपि बलोत्कटैः । विश्वस्ताश्चाशु बध्यन्ते बलवन्तोऽपि दुर्बलैः ॥ ४६ ॥ अविश्वासी दुर्बलकोभी बलवान् बली नहीं बाध सक्ता, विश्वासी बलवान्भी दुर्बलोंसे बाधलिये जाते हैं ॥ ४६ ॥ सुकृत्यं विष्णुगुप्तस्य मित्राप्तिर्भार्गवस्य च । बृहस्पतेरविश्वासो नीतिसन्धिश्चिधा स्थितः ॥ ४७ ॥ तीन प्रकारकी नीति सधी होती है चाणक्यका सम्यक् कार्यानुष्ठान करना, परशुरामका मित्रलाभ और बृहस्पतिका मत है विश्वास न करना यह तीन प्रकारकी नीतिसंधी है ॥ ४७ ॥ तथाच- तैसेही- महताप्यर्थसारेण यो विश्वसिति शत्रुपु । भार्यासु सुविरक्तासु तदन्तं तस्य जीवितम् ॥ ४८ ॥" बडे अर्थसार परभी शत्रु का जो विश्वास करता है और विरक्त भार्याका जो विश्वास करता है उनके अन्ततक ही उसका जीवन है ॥ ४८ ॥”- तच्छ्रुत्वा लघुपतनकोऽपि निरुत्तरः चिन्तयामास । "अहो ! बुद्धिप्रागल्भ्यमस्य नीतिविषये । अथवा स एव अस्योपरि मैत्रीपक्षपातः”। स आह-“भो हिरण्यक ! यह सुन लघुपतनकभी निरुत्तरहो विचारने लगा, "अहो नीतिविषयमें कितनी तीक्ष्ण इसकी बुद्धि है, अथवा वह इसपर मित्रताका पक्षपात है” और बोला-"भो हिरण्यक ! सतां साप्तपदं मैत्रमित्याहुर्विबुधा जनाः । तस्मात्त्वं मित्रतां प्राप्तो वचनं मम तच्छृणु ॥ ४९ ॥