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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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भाषाटीकासमेतम् । (९)

सम्पूर्ण उपायोमे बेचने योग्य द्रव्यका सग्रहही एक उत्तम है और सशयात्मक हैं ॥ १२ ॥ तच्च वाणिज्यं सप्तविधमर्थागमाय स्यात्तद्यथा गान्धिकव्य- वहारो, निक्षेपप्रवेशो, गोष्ठिककर्म, परिचितग्राहकागमो, मिथ्याक्रयकथनं, कूटतुलामानं, देशान्तराद्भांडानयनञ्चेति । उक्तञ्च- वह वाणिज्य सातप्रकारका धनके निमित्त होता है, गन्धद्रव्यका व्यवसाय, निक्षेप प्रवेश अर्थात् रुपयेका अपने यहा जमा करना उसे ब्याज देना, गोस्सम्ब- न्धीकर्म, पहचाने हुए ग्राहकोंका आना (कारण कि, जानाहुआ ग्राहक दुरुक्ती नहीं करता है), वस्तुका मिथ्या मोल कहना (थोडे मूल्यमें खरीद कर अधिक मोल बताना), कमती तोलना, देशान्तरोंसे बरतन द्रव्यादिका लाना, कहा है कि- पण्यानां गान्धिकं पण्यं किमन्यैः काञ्चनादिभिः । यत्रैकेन च यत्क्रीतं तच्छतेन प्रदीयते ॥ १३ ॥ बेचने योग्य द्रव्योंमे सुगन्धि द्रव्यका व्यापार श्रेष्ठ है और दूसरे सुवर्णादिसे क्याहै; जो कि, एकसे मोल लेकर सौको बेचा जाता है ॥ १३ ॥ निक्षेपे पतिते हर्म्ये श्रेष्ठी स्तौति स्वदेवताम् । निक्षेपी म्रियते तुभ्यं प्रदास्याम्युपयाचितम् ॥ १४ ॥ धरोहर घरमे आनेसे सेठ अपने देवताकी स्तुति करता है कि, यदि यह धरोहरवाला मर जाय, तो मै तुझको अभिमत वस्तुसे पूजन करूंगा ॥ १४ ॥ गोष्ठिककर्मनियुक्तः श्रेष्ठी चिन्तयति चेतसा हृष्टः । वसुधा वसुसंपूर्णा मयाद्य लब्धा किमन्येन ॥ १५ ॥ गोष्ठीकर्ममें नियुक्त हुआ श्रेष्ठी प्रसन्न मनहो विचारता है, मैने धनसे पूर्ण पृथ्वीकी प्राप्ति की और क्या चाहिये ॥ १५ ॥ परिचितमागच्छन्तं ग्राहकमुकण्ठया विलोक्यासौ । हृष्यति तद्धनलुब्धो यद्वत्पुत्रेण जातेन ॥ १६ ॥ पहचाने ग्राहकको आता हुआ देखकर उत्कठासे यह उसके धनसे ऐसे प्रसन्न होताहै; जैसे पुत्र उत्पन्न होनेसे ॥ १६ ॥