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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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(२२६) पञ्चतन्त्रम् । जिसका पराक्रम, कुल और चेष्टा न जाने उसकी संगति नकरे ऐसा बृहस्पतिने कहा है ॥ ६३ ॥” एवमुक्ते लघुपतनको वृक्षात् अवतीर्य तमालिङ्गितवान् अथवा साधु चेदमुच्यते- ऐसा कहनेपर लघुपतनक वृक्षसे उतरकर उसे आलिंगन करता भया । अथवा अच्छा यह कहा है- अमृतस्य प्रवाहैः किं कायक्षालनसम्भवैः । चिरान्मित्रपरिष्वङ्गो योऽसौ मूल्यविवर्जितः ॥ ६४ ॥” शरीरके धोनेमात्रसे उत्पन्न अमृतके प्रवाहोंसे क्या है, चिरकालमें मित्रका आलिंगन मूल्यवर्जित है ॥ ६४ ॥” एवं द्वौ अपि तौ विहितालिङ्गनौ परस्परं पुलकितशरीरौ वृक्षादधः समुपविष्टौ प्रोचतुः आत्मचरित्रवृत्तान्तम् । हिर- ण्यकोऽपि मन्थरकस्य प्रणामं कृत्वा वायसाभ्यासे समुपविष्टः । अथ तं समालोक्य मन्थरको लघुपतनकमाह,-“भोः ! कोऽयं मूषकः ? कस्मात् त्वया भक्ष्यभूतोऽपि पृष्ठमारोप्य आनीतः ? तन्न अत्र स्वल्पकारणेन भाव्यम्” । तत् श्रुत्वा लघुपतनक आह,-“भोः! हिरण्यको नाम मूषकोऽयम्, मम सुहृत् द्वितीयमिव जीवितम् । तत् किं बहुना,- इस प्रकार वे दोनों ही आलिंगनकर परस्पर पुलकित शरीर हो वृक्षके नीचे बैठे अपना वृत्तान्त कहने लगे । हिरण्यकभी मंथरको प्रणाम कर वायसके निकट बैठा, तब उसको देखकर मन्थरक लघुपतनकसे बोला-“भो ! यह मूषा कोनहै ? क्यों यह तुमने भक्ष्य पदार्थ अपनी पीठपर बैठाकर लाया है ? सो इसमें लघु कारण न होगा,” यह सुनकर लघुपतनक बोला-,“भो ! यह हिरण्यक मूषोंका राजा है मेरा मित्र दूसरा प्राण है । बहुत कहनेसे क्या है- पर्ज्जन्यस्य यथा धारा यथा च दिवि तारकाः । सिकता रेणवो यद्वत्संख्यया परिवर्जिताः ॥ ६५ ॥ जैसे मेघकी धारा जैसे स्वर्गमें तारे जैसे रेणुकी संख्या नहीं हो सक्ती॥ ६५ ॥

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