पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेतम् । ( २२९ ) अगम्य नहीं है । सो आप क्यों वृथा और स्थानमें अटन करते हो । आज हम वहां जाकर आपके प्रसादसे यथेच्छ भोजन करें" यह सुनकर मैं सम्पूर्ण चूष्रके साथ उसी क्षणमें वहा गया और कूदकर उस भिक्षापात्रमें आरूढ हुआ । उसके भक्ष्य पदार्थ सेवकोंको देकर पीछे मैं भी भक्षण करूं । सबकी तृप्ति होनेमें फिर अपने घरमें आऊ । इस प्रकार नित्यही उस अन्नको खाऊ संन्यासी भी यथाशक्ति रक्षा करता था । परन्तु जब वह सोता, तब मै उसपर चढकर आपना काम करूं । एक समय उसने मेरी रक्षाके लिये बडा यत्न किया । फटाबांस लाया, उससे सोतेमे भी मेरे भयसे भिक्षापात्रको ताडन करता मैभी विना अन्नके भक्षण कियेही प्रहारके भयसे वहासे चला जाऊ । इस प्रकार सब रातका समय उसके साथ विग्रह करते बीता । किसी दिन उसके मठमें बृहत्स्फिक् नामवाला सन्यासी उसका मित्र तीर्थयात्रा प्रसंगसे पान्थ अतिथि प्राप्त हुआ । उसको देख प्रत्युत्थान विधिसे सम्भावित कर सन्मान पूर्वक अतिथि सत्कारमें नियुक्त किया । फिर रात्रिमें एकही कुशके बिछोनेमें दोनो लेटे हुए धर्मकथा कहने लगे । तब बृहत्स्फिक्की कथा गोष्ठीमें वह ताम्रचूड मूषेके डरानेमें व्याक्षिप्त मनवाला जर्जरवंशसे भिक्षापात्र ताडन करता हुआ उसको शून्य हुंकारा देताथा परन्तु मूषेके ध्यानसे कुछ नहीं कहता, तब यह अभ्यागत परम क्रोधको प्राप्त हुआ उससे बोला,—"भो ताम्रचूड ! अच्छी प्रकार मैंने जाना कि तू हमारा सुहृत् नहीं है इसी कारण आनन्दसे तू हमसे नहीं बोलता है । सो रात्रिमेंही तुम्हारे मठको त्यागनकर और मठमें जाऊंगा । कहा है— एह्यागच्छ समाश्रयासनमिदं कस्माच्चिराद्दृश्यसे कावार्त्ता अतिदुर्बलोऽसि कुशलं प्रीतोऽस्मि ते दर्शनात् । एवं ये समुपगतान्रणयिनः प्रह्लादयन्त्यादरा- त्तेषां युक्तमशङ्कितेन मनसा हर्म्याणि गन्तुं सदा ॥ ६७ ॥ यहा आओ, बैठो, यह आसन है, किसकारण बहुत दिनोंमें दीखेहो ? क्या वार्त्ता है ? बहुत दुबले हो ? कुशल है ? मैं आपके दर्शनसे कुशलहू इस प्रकार जो प्रेमी आये हुए अपने सुहृदोंको आदरसे आनन्दित करते हैं उनके घरमें अशंकित मनसे सदा जाना चाहिये ॥ ६७ ॥