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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

by पण्डित विष्णु शर्मा

Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)

DevanagariHindipublished536 pages

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भाषाटीकासमेतम् । (२४१) मार्गसे आकर उपस्थित हुआ । और फिर अपने हाथसे खोदना प्रारंभ किया । तब खोदते हुए उसने वह निधि पाई जिसके ऊपर मैं अहंकारसे निवास करता था, जिसकी गरमीसे महादुर्गकोभी जा सक्ता था । तब प्रसन्न होकर ताम्रचूडसे अभ्यागत बोला,-"भो भगवन् ! अब निश्शंक शयन करो। इसीकी गरमीसे यह मूषक आपको जगाताहै" । यह कह दोनो धनको ले मठकी ओरको चले और मैंभी जबतक निधान रहित स्थानको प्राप्त होताहू तबतक अशोभित उद्वेगकारक उस स्थानको देखनेमें भी समर्थ न होकर विचारने लगा" क्या करू कहा जाऊ कैसे मेरे मनकी शान्ति हो ?"। इस प्रकार महाकष्टसे वह दिन बीता । फिर सूर्यके अस्तमें उद्वेगसे उत्साहहीन होकर उस मठमें परिवारसहित प्रविष्ट हुआ तब हमारे परिवारके शब्दको सुनकर ताम्रचूड फिरभी भिक्षापात्रको जर्जर वाससे ताडन करने लगा । तब यह अभ्यागत बोला-"सखे ! क्यों अब भी निश्शंक होकर नहीं सोता है ?"। वह बोला-"भगवन् ! फिर भी आया यह दुष्टात्मा मूषक परिवार सहित । उसके भयसे जर्जर बाशमे भिक्षापात्रको ताडन करता हूँ"। तब हँसकर अभ्यागत बोला,-"सखे ! मत डर धनके सहितही इसके कूदनेका उत्साह नष्ट हुआ है सब जन्तुओंकी यही स्थितिहै, कहाहै । यद्युत्साही सदा मर्त्यः पराभवति यज्जनान् । यदुद्धतं वदेद्वाक्यं तत्सर्वं वित्तजं बलम् ॥ ९१ ॥ जो मनुष्य सदा उत्साही है और मनुष्योंको पराभव करता है जो उद्धत वाक्य कहता है वह सब धनका उत्पन्न हुआ बल जानो ॥ ९१ ॥ अथ अहं तत् श्रुत्वा कोपाविष्टो भिक्षापात्रमुद्दिश्य विशे- षादुत्कूर्दितोऽप्राप्त एव भूमौ निपतितः । तत् श्रुत्वा असौ मे शत्रुर्व्हिहस्य ताम्रचूड़मुवाच-“भोः पश्य पश्य कौतूहलम् ” । आह च- तब मैं यह सुन क्रोधित हो भिक्षापात्रकी ओरको विशेष कूदने लगा पर वहा न पहुचकर भूमिमें गिरा यह सुन यह मेरा शत्रु हँसकर ताम्रचूड- से बोला-“भो ! देखो २ कुतूहल-“बोला भी- १६