पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
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Read in context(२५४) पञ्चतन्त्रम् । मेरा पुत्र है” ऐसा नगरमें विदित कर उसको युवराज्यमें अभिषिक्त कर दिया । दंडपाशकनेभी अपनी कन्या निजशक्तिके अनुसार वस्त्रपानादिसे सत्कृत कर प्राप्तव्यमर्थको दी प्राप्तव्यमर्थने भी अपने पिता माताको समस्त कुटुम्बके सहित उस नगरमें सम्मानपूर्वक बुलाया, वहभी अपने गोत्रोंके सहित अनेक भोगोंको भोगता हुआ सुखसे रहा। इससे मैं कहता हूं- “प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो देवोऽपि तं लंघयितुं न शक्तः । तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ॥ ११८ ॥” मनुष्य प्राप्तव्य अर्थको प्राप्त होता है, उसे देवभी उल्लंघन करनेको समर्थ नहीं, इस कारण न मैं शोच करता हूं, न मुझको विस्मय है, क्यों कि, जो हमारा है वह दूसरोंका नहीं ॥ ११८ ॥” तदे तत्सकलं सुखदुःखमनुभूय परं विषादमुपागतोऽने- न मित्रेण त्वत्सकाशमानीतः । तदेतत् मे वैराग्यकारणम्” । मन्थरक आह,-“ भद्र ! भवति सुहृदयसन्दिग्धं यत् क्षुत्क्षामोऽपि शत्रुभूतं त्वां भक्ष्यस्थाने स्थितमेवं पृष्ठमारोप्य आनयति न मार्गेऽपि भक्षयति । उक्तञ्च यतः- सो यह सम्पूर्ण दुःख सुख अनुभव करके परम विषादको प्राप्त हुए मित्रने मुझे तुम्हारे पास प्राप्त किया है। यह मेरे वैराग्यका कारण है” । मन्थरक बोला,-“भद्र ! यह काग असंशय मित्रहीहै, जो भूखसे व्याकुल भी शत्रुभूत तुमको भक्ष्यस्थानमें स्थितही पीठपर आरोपणकर लाया मार्गमेंभी भक्षण न किया । कारण कहा है- विकारं याति नो चित्तं वित्ते यस्य कदाचन । मित्रं स्यात्सर्वकाले च कारयेन्मित्रमुत्तमम् ॥ ११९ ॥ जिसका चित्त कभी धनसे विकारको प्राप्त नहीं होता है वही मित्र है सदैव ऐसे मित्रको करै ॥ ११९ ॥