पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
by पण्डित विष्णु शर्मा
Source: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (origin)
Page 274 of 536
Read in contextभाषाटीकासमेतम् । ( २९९ ) किसी स्थानमें सोमिलक नाम कौलिक रहता था, वह अनेक प्रकार पटर- चनासे रजित राजाओंके योग्य वस्त्र सदा बनाता था और उसके अनेकविध पट- रचनामें निपुण होकरभी भोजनाच्छादनसे अधिकधन न प्राप्त होता और दूसरे साधारण जुलाहे मोटे वस्त्र बुनना जानने वाले बडे धनवाले थे । उनको देखकर यह अपनी भार्यासे बोला,–“प्रिये ! इन मोटे कपडे बनाने वालोंको देखो जो धन सुवर्णसे सम्पन्न हैं । सो यह स्थान हमको लेना फागना नहीं है । सो और स्थानमें धन उपार्जनके निमित्त जाताहू ” । वह बोली,--“ भो प्रियतम ! यह सब मिथ्या प्रलाप है जो और स्थानमे जाकर धन होता है अपने स्थानमे नहीं होता । कहा है- उत्पतन्ति यदाकाशे निपतन्ति महीतले । पक्षिणां तदपि प्राप्त्या नादत्तमुपतिष्ठति ॥ १३३ ॥ जो आकाशमें उडते पृथ्वीमे गिरते हैं उन पक्षियोंकोभी विनादिया अन्न प्राप्त नहीं होता है ॥ १३३ ॥ तथाच- तैसेही- न हि भवति यन्न भाव्यं भवति च भाव्यं विनापि यत्नेन । करतलगतमपि नश्यति यस्य तु भवितव्यता नास्ति१३४॥ जो होनहार नहीं है वह नहीं होता है जो होनहार है वह यत्नके विनाही होजाता है जिसकी प्राप्ति नहीं है वह हाथमे प्राप्त हुआ भी नष्ट होजाता है१३४ यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् । तथा पुरा कृतं कर्म कर्त्तारमनुगच्छति ॥ १३५ ॥ जैसे सहस्र धेनुओमें बछडा माताको पहचानता है इसी प्रकार पूर्व किया कर्म कर्ताको पहुचता है ॥ १३५ ॥ शेते सह शयानेन गच्छन्तमत्तुगच्छति । नराणां प्राक्तनं कर्म तिष्ठेत्त्वथ सहात्मना ॥ १३६ ॥ सोतेके साथ सोता है, चलतेके साथ चलता है, बहुत क्या मनुष्योका किया कर्म आत्माके साथ रहता है ॥ १३६ ॥ यथा छायातपौ नित्यं सुसम्बद्धौ परस्परम् । एवं कर्म च कर्त्ता च संश्लिष्टावितरेतरम् ॥ १३७ ॥